16 फरवरी दिन बुधवार को माघ मास की पूर्णिमा है। इस दिन सूर्योदय 6 बजकर 24 मिनट पर और पूर्णिमा तिथि का मान रात को 10 बजकर 9 मिनट तक, श्लेष्मा नक्षत्र दिन में 3 बजकर 30 मिनट पश्चात मघा नक्षत्र और शोभन योग रात 8 बजकर 52 मिनट तक है। मघा नक्षत्र और शोभन योग योग से युक्त होने से यह पूर्णिमा स्नान, दान, जप और तर्पण इत्यादि के लिए अत्यंत श्रेयस्कर रहेगी।
पवित्र नदियों में स्नान करने से होती है मोक्ष की पाप्ति
माघ
पूर्णिमा तिथि का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस दिन पवित्र नदियों
में सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। संतान सुख
प्राप्त होता है और समस्त पाप धुल
जाते हैं। इस दिन सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी, जलाशय का जल मिलाकर
घर पर भी स्नान किया जा सकता है। स्नान के पश्चात भगवान नारायण की पूजा
करनी चाहिए। दोपहर के समय गरीब ब्राह्मणों एवं निर्धनों को भोजन कराकर
दान-दक्षिणा देने का विधान है। दान में काले तिल का बहुत ही महत्व माना गया
है। काले तिल से हवन और काले तिल से ही पितरों का तर्पण करना चाहिए।
माघ माह में देवता पृथ्वी पर आते हैं
मघा
नक्षत्र के नाम से माघ मास के पूर्णिमा की उत्पत्ति होती है। मान्यता है
कि माघ माह में देवता पृथ्वी पर आते हैं और मनुष्य का रूप धारण कर
प्रयागराज में स्नान करते हैं। इसलिए कहा गया है कि इस मास में प्रयाग में
स्नान करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शास्त्रों के अनुसार यदि
माघ पूर्णिमा के दिन मघा नक्षत्र हो तो ज्यादा ही महत्वपूर्ण जाता है। माता
लक्ष्मी के स्वागत के लिए इस दिन माता को दीपक और जल चढ़ाना चाहिए तथा
चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिए। पीपल के पेड़ पर कुछ मीठा चढ़ाकर जल देने से समस्त पाप धुल जाते हैं। एक महीने तपस्या करने के पश्चात प्रयाग से कल्पवासी और तपस्वी अपने-अपने घरों को लौटते हैं। उनके पास जो कुछ शेष रहता है उसे वे दान कर देते हैं।
यह
महीना वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस महीने में ठंड समाप्त
होने लगती है और वसंत ऋतु प्रारंभ होने लगता है। ऋतु परिवर्तन होता है। ऋतु
परिवर्तन का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े इसलिए प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से शरीर को मजबूती मिलती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लेख है कि माघ की पूर्णिमा पर भगवान विष्णु नदियों के जल में निवास करते हैं। अतः पवित्र जल का स्पर्श होने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाभारत में कहा गया है कि इन दिनों 3 करोड़
देवताओं का प्रयाग में समागम होता है और और यह भी बताया गया है कि भगवान
दान से उतने प्रसन्न नहीं होते हैं जितना कि माघ महीने के स्नान करने से।
यही कारण है कि प्राचीन काल में नारायण को पाने का आसान मार्ग माघ पूर्णिमा
के स्नान को बताया गया है। महर्षि भृगु के सुझाव पर व्याघ्रमुख वाले विद्याधर और गौतम ऋषि द्वारा अभिशाप से युक्त इन्द्र
माघ स्नान से शाप से मुक्त हुए थे। मत्स्य पुराण में बताया गया कि माघ
महीने की पूर्णिमा को कोई ब्राह्मण सुपात्र को दान करता है तो उसे दिव्य
लोक की प्राप्त होती है।
माघ पूर्णिमा पर स्नान से दूर होते हैं सूर्य, चंद्र दोष
यद्यपि माघ मास की प्रत्येक तिथि फलदाई
है परंतु उसमें पूर्णिमा का अपना विशिष्ट महत्व है। यदि कुंडली में सूर्य,
चंद्रमा से संबंधित दोष हो तो उसे इस दिन स्नान-दान की करने से दूर किया
जा सकता है। इस दिन के स्नान-दान से सूर्य और चंद्रमा दोनों देवता प्रसन्न
होते हैं और मन की अभिलाषा की संपूर्ति के लिए कृपा प्रदान करते हैं। इस दिन गुड़, घी, फल अन्न और कंबल के दान करने का विधान है। यह भारतीय संवत्सर का 11वां चंद्रमास और सूर्य से दसवां सौर मास होता है। मघा नक्षत्र से युक्त होने से इसका नाम माघ पड़ा है। भगवान नारायण क्षीरसागर में निवास करते हैं और गंगा जी सहित समस्त नदियां क्षीरसागर
का ही रूप हैं। इस दिन चन्द्रमा अपनी सोलह कलाओं से युक्त रहता है।
पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा से अमृत की वर्षा होती है। जिसका प्रभाव जल और
वनस्पतियों पर पड़ता है। अतःमकर
राशि में सूर्य का प्रवेश और सिंह राशि पर चंद्रमा की युति का योग बनता
है। इस दिन भगवान नारायण का तेज जल में विद्यमान रहता है जो समस्त पापों के
उपशमन में सहायक होता है। निर्णय सिंधु में कहा गया है कि माघ महीने में
मनुष्य को कम से कम एक दिन तो अवश्य पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। यदि
प्रतिदिन न कर सकें तो माघ पूर्णिमा के दिन अवश्य स्नान करें।
माघ पूर्णिमा के दिन प्रयागराज में स्नान का बड़ा
महत्व है। प्रयाग की महत्ता वेदों और पुराणों में विस्तार से बताई गई है।
एक बार शेषनाग से ऋषियों ने प्रश्न किया कि प्रयागराज को तीर्थों का राजा
क्यों कहा जाता हैॽ
इस पर शेष जी ने उत्तर दिया कि एक बार एक ऐसा अवसर आया कि सभी तीर्थों की
तुलना की जाने लगी। उसमें भारत के सभी तीर्थों को एक तरफ रख दिया गया और
प्रयागराज को दूसरे पलड़े पर। प्रयागराज वाला पलड़ा
भारी हो गया। इस तरह प्रयागराज की प्रधानता होने से इसे सभी तीर्थों का
राजा कहा जाने लगा। इस पवित्र स्थान में दान, पुण्य, यज्ञ, कर्म इत्यादि का
अपना विशिष्ट महत्व है। यदि यह सब त्रिवेणी संगम पर किया जाए तो अत्यंत
फलप्रद रहता है। रामायण ग्रंथ के अनुसार संपूर्ण विश्व का एकमात्र परम
पवित्र स्थान प्रयागराज है। यहां गंगा, यमुना, सरस्वती तीन नदियों का संगम
है। इस स्थान पर ब्रह्मा ने यज्ञ किया था।
मार्कंडेय पुराण के
अनुसार युधिष्ठिर ने मार्कंडेय जी से प्रश्न किया था कि वे कृपा कर प्रयाग
के महत्व के बारे में बताएं , वहां स्नान का क्या फल प्राप्त हैॽ इस पर मार्कंडेय जी ने कहा कि प्रयाग के प्रतिष्ठानपुर से लेकर वासुकी के हृदय तक, कंबल और अश्वतर नाम के दो नाग रहते हैं। यह भगवान प्रजापति का क्षेत्र है। यहां निवास कर स्नान करने का क्या फल मिलता हैॽ
इसके बारे में उन्होंने कहा कि अन्य स्थानों पर पाप कर्मों का नाश पुण्य
करने से होता है। यदि प्रयाग में गंगा के जल का स्पर्श भी कर लिया जाए तो
कोटि जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। पुण्य क्षेत्रों में हुए पापों का
नाश कुंभकोणम में होता है। कुम्भकोणम
के पाप का नाश वाराणसी में होता है और वाराणसी में हुए पापों का नाश
प्रयाग में और प्रयाग में हुए पाप का नाश यमुना में, यमुना में हुए पाप का
नाश सरस्वती में और सरस्वती में हुए पाप का नाश गंगा में और गंगा में हुए
पाप का नाश त्रिवेणी पर होता है। त्रिवेणी में हुए पाप का नाश प्रयागराज
में रहने और स्नान करने से मिलता है। इस तरह की मान्यता का वर्णन प्रयाग माहात्म्य के तीसरे अध्याय में श्लोक 8 से 13 तक वर्णित है।
-आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी, रुस्तमपुर, गोरखपुर
Keywords: dharm, dharma, magh purnima
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गूगल खोज से ली गई हैं, यदि किसी फोटो पर किसी को कॉपीराइट विषय पर आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगी
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