अखंड सौभाग्य का व्रत हरितालिका तीज 18 सितम्बर को

भविष्य पुराण, व्रतराज व निर्णय सिंधु में हरितालिका तीज के विषय में कहा गया है कि भाद्रपद शुक्ल तृतीयाम शिष्टपरिगृहीतं हरितालिका व्रतम्। तच्च पर युवायां (विद्वायां) कार्यम्’। अर्थात तृतीया यदि मुहूर्त मात्र भी सूर्योदय के पश्चात हो तो उसी तिथि को ग्रहण करें। परन्तु द्वितीया तिथि से थोड़ा भी स्पर्श करने से निषिद्ध माना गया है। क्यों कि द्वितीया पितामह की और चतुर्थी पुत्र की तिथि है। अत: द्वितीया का योग निषेध व चतुर्थी का योग श्रेष्ठ होता है।

18 सितम्बर दिन मंगलवार को सूर्योदय 5 बजकर 56 मिनट और तृतीया तिथि का मान 52 दंड शून्य पला अर्थात रात्रि 2 बजकर 44 मिनट तक है। रात्रि शेष में चतुर्थी होने से यह ग्राह्य तिथि है। शास्त्र में इस व्रत को करने के लिए सधवा व विधवा दोनों को आज्ञा है।


पूजन विधि

धर्मप्राण स्त्रियों को चाहिए कि वे ‘मम् उमामहेश्वर सायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रतं अहं करिष्ये’ यह संकल्प लेकर मंडप आदि बनवाएं और पूजन सामग्री एकत्र करें। इसके बाद कलश स्थापन कर उसपर शिव, गौरी व गणेशजी की स्थापना करें और उसके समीप बैठकर पूजन करें। पुष्पांजलि देने के समय ‘ऊं उमायै, पार्वत्यै, जगद्धात्यै, जगत्प्रतिष्ठायै, शांतिरूपिण्यै, शिवायै और ब्रह्म रुपिण्यै नम:’ मंत्र से उमा को और ‘ऊं हराम्, महेश्वराम्, शम्भवे, शूलपाणने, पिनाकधृषे, शिवाय, पशुपतये और महदेवाय नम:’ मंत्र से महेश्वर को पुष्पांजलि प्रदान करें। धूप- दीप से षोडसोपचार पूजन करें और ‘देवि देवि उमे गौरी त्राहि मां करुणानिधे। ममापराधा: क्षन्तव्या भुक्ति मुक्ति प्रदा भव।’ से प्रार्थना करें और निराहार रहें।


महात्य कथा


माता सती जब अपने पिता दक्ष के यज्ञ में जलकर भस्म हो गर्इं तो उसके पश्चात उन्होंने मैना व हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और पार्वती कहलार्इं। पार्वती बाल्यावस्था से ही शिव को पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कठोर शिव आराधना प्रारंभ किया। उन्होंने वर्षों तक अन्न का परित्याग कर तपस्या की। जब इनकी तपस्या फलोन्मुख हो रही थी तो उसी समय नारदजी हिमालय के यहां आए और उन्होंने पार्वती का विवाह भगवान विष्णु के साथ कराने का प्रस्ताव रखा। हिमालय इस प्रस्ताव को पाकर प्रसन्न हो गए और अपनी पुत्री को मनाने का प्रयास करने लगे। यह सुनकर पार्वती मूर्छित हो गर्इं। होश आने पर उन्होंने घनघोर जंगल में शिव की आराधना करने का निश्चय किया। अपनी सखियों के साथ पार्वती ने घने जंगल में जाकर एक गुफा में भाद्र मास के शुक्ल तृतीया के दिन शिवलिंग की स्थापना कर तपस्या आरंभ किया। फलस्वरूप भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया और पत्नी के रूप में उनका वरण करने का वरदान दिया। इस हरितालिका के दिन तपस्या आरंभ करने के कारण पार्वतीजी को मनोनुकूल पति अर्थात शिवजी की प्राप्ति हुई। इसके बाद से ही मनोनुकूल वर प्राप्ति व अखंड सौभाग्य के लिए स्त्रियां यह व्रत रहती हैं।

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