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हिंदू धर्म
हिंदू धर्म विश्व का सबसे प्राचीन धर्म है। यह भारत में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त धर्म है। भारतीय मनीषियों, विद्वानों, ऋषि मुनियों तथा दार्शनिकों का आध्यात्मिक कोष है। इस धर्म को सनातन तथा वैदिक धर्म भी कहा जाता है। वस्तुत: वैदिक धर्म के विकसित रूप को ही हिन्दू धर्म कहा जाता है। हिन्दू धर्म में अनेक देवी देवताओं की पूजा की जाती है। इस धर्म में अवतारवाद को विशेष महत्व दिया जाता है। महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध एवं गुरुनानक हिन्दू परिवार में ही उत्पन्न हुए थे। हिन्दू धर्मों के पवित्र ग्रंथों में वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, श्रीमद़भगवत गीता, श्रीरामचरितमानस आदि को सम्मिलित किया जाता है। ऋग्वेद सबसे प्राचीन वेद है। हिन्दू धर्म में ब्रह़मा, विष़्णु, महेश त्रिदेवों को संसार का निर्माता, पालक व संहारक माना जाता है। इस धर्म में नैतिकता व सदाचार पर विशेष बल दिया जाता है तथा पुनर्जन्म व मूर्तिपूजा में विश्वास किया जाता है। हिन्दू धर्म के प्रमुख तीन संप्रदाय हैं।
वैष्णव संप्रदाय
भगवान विष्णु में श्रद्धा व आस्था रखने वाले लोग वैष्ण्व कहलाते हैं। कालान्तर में अवतारवाद के आधार पर विष्णु के दो अवतारों राम व कष्ण की पूजा विशेष रूप से प्रचलित हुई। आज भी हिन्दुओं में इन्हीं की पूजा सर्वाधिक होती है।
शैव संप्रदाय
भगवान शिव में आस्था व श्रद्धा रखने वाले लोग शैव संप्रदाय की श्रेणी में आते हैं। शैव संप्रदाय के प्रवर्तक आदि शंकराचार्य थे। यह सबसे बडे दार्शनिक व विचारक थे। उपवास रखना व शरीर पर राख रखना, भांग आदि मादक द्रव्यों का सेवन करना, नित्य व्यायाम करना, व्रत रहकर कठोर तपस्या करना आदि इस संप्रदाय के सिद्धान्त माने जाते हैं। शैव संप्रदाय के अंतर्गत शाक्त संप्रदाय, वीर शैव संप्रदाय आदि उप संप्रदाय उत्पन्न हो गए।
शाक्त संप्रदाय
शिव की शक्ति की उपासना करने वाले लोग शाक्त कहलाते हैं। देश के अनेक भागों में शक्ति की उपासना का प्रचलन है। शाक्त धर्म में उमा, पार्वती, अन्नपूर्णा, काली, चण्डी, चामुण्डा देवी की पूजा की जाती है।
महत्वपूर्ण धर्मग्रंथ वेद
वेदों की कुल संख्या चार है.. ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्वेद।
ऋग्वेद
भारतीय आर्यों की प्राचीनतम पुस्तक ऋग्वेद है। इसमें ऋचाओं अथवा स्तुति मंत्रों का संकलन किया गया है। ऋग्वेद में 1018 सूक्त हैं। इसमें दस मंडल हैं। 10580 ऋचाएं हैं। ऋग्वेद में प्रत्येक ऋचा के साथ उसके ऋषि तथा देवता का नाम भी लिया गया है। ऋग्वैदिक सूक्तों से तत्कालीन सभ्यता एवं संस्कृति का परिचय मिलता है।
यजुर्वेद
यजुर्वेद याज्ञिक मंत्रों का संकलन मात्र है। इसकी शैली गद्यात्मक है। इसके मंत्रों का संकलन ऋग्वेद तथा अथर्ववेद से किया गया है। इसमें कुल 40 अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय का संबंध किसी न किसी याज्ञिक क्रिया से है। महर्षि पतंजलि के समय यजुर्वेद 101 शाखाओं में उपलब्ध था परन्तु आज केवल इसकी छह शाखाएं ही प्राप्त हैं।
सामवेद
महाभाष्य से यह ज्ञात होता है कि सामवेद की एक सहस्र शाखाएं हैं। परन्तु वर्तमान में तीन शाखाओं की ही जानकारी प्राप्त हुई है। यह है..कौथुम, राणायनीय व जैमिनीय। सामवेद संगीतमय वेद है। इसमें कुल 99 मूल मंत्र है। शेष मंत्रों को ऋग्वेद से संकलित किया गया है। यह दो भागों में है। पहले भाग में छह अनुभाग हैं, जिनको प्रपाठक कहा गया है तथा दूसरे भाग में नौ प्रपाठक हैं। सामवेद को भारतीय संगीत का प्रथम ग्रंथ भी कहा जाता है।
अथर्ववेद
इसमें बीस काण्ड, चौतीस प्रपाठक, 111 अनुवाक, 731 सूक्त तथा 5839 मंत्र हैं। इसमें अनेक संस्कारों तथा कर्मकाण्डों का वर्णन किया गया है। यह वेद सामान्य भौतिकवादी विषयों तथा दर्शन एवं अध्यात्मवाद जैसे गूढ विषयों का समन्वय है। वर्तमान में इसकी केवल दो ही शाखाएं उपलब्ध हैं। पिप्पलाद तथा सौना।
ब्राह़मण ग्रंथ
ऋषियों द्वारा वेदों की गद्य में की गई सरल व्याख्या को ब्राहमण ग्रंथ कहा जाता है। प्रत्येक वेद के अपने ब्राहमण ग्रंथ हैं। जिनमें ऋग्वेद के कौशीतकीय एवं ऐतरेय, यजुर्वेद के शतपथ, सामवेद के पंचविश, अथर्ववेद के गोपथ आदि प्रमुख हैं। इन् ब्राहमण ग्रंथों से प्राचीन आर्यों की सामाजिक, राजनैतिक तथा धार्मिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है।
आरण्यक
ब्राहमण ग्रंथों के परिशिष्ट भागों को आरण्यक कहते हैं। अध्यात्म का चिंतन आरण्यक ग्रंथों का मुख्य विषय है। इसमें आत्मा, मृत्यु, तथा जीवन से संबंधित विषयों के बडे उच्च विचार व्यक्त किए गए हैं। इनका पठन-पाठन वानप्रस्थी मुनि तथा वनवासियों द्वारा वन में किया जाता था। आरण्यक का अर्थ होता है जंगल। इन ग्रंथों की संख्या सात है।
उपनिषद-
उप का अर्थ है निकट तथा निषद का अर्थ है बैठना। अर्थात जिन ग्रंथों की शिक्षा शिष्य अपने गुरु के निकट बैठकर प्राप्त करते थे, उन्हें आर्यों ने उपनिषद का नाम दिया था। इनकी संख्या 54 के लगभग है। इनमें अध्यात्म विद्या के विकट तथा बोध रहस्यों का विस्तार से वर्णन है। इनमें छांदोग्य, मांडूक्य, तैतरीय, श्वेताश्वतर, ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न आदि प्रमुख हैं। वेदांग- वेदांगों की रचना का मुख्य उद़देश्य वेदों के ज्ञान तथा रहस्य को स्पष्ट करना था। इनका रचना काल उत्तर वैदिक काल माना गया है। इनकी संख्या छह है। शिक्षा (स्वर शास्त्र), कल्प (कर्मकाण्ड), व्याकरण, निरुक्त (शब्द व्युत्पत्ति विद्या), छंद तथा ज्योतिष व पुराण।
पुराण-
पुराण का अर्थ है पुराना आख्यान। पुराणों की संख्या 18 है। इनमें प्राचीन आख्यान तथा इतिहास का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके अंतिक अध्याय में वर्णित में प्राचीन राजवंशावलियों जैसे शूल, कण्व आदि के कारण इनका ऐतिहासिक महत्व बढ गया है। प्रत्येक पुराण को पांच भागों में विभक्त किया गया है। इनमें प्राचीन महापुरुषों, देवताओं, ऋषियों तथा धार्मिक व राजनीतिक विषयों का वर्णन किया गया है। पुराणों में स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, मारकण्डेय पुराण, मत्स्य पुराण के नाम विशेष रूप से उलेखनीय हैं। स्मृतियां-
स्मृतियों की संख्या अनेक है। परन्तु इनमें मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, विष्णु स्मृति, नारद स्मृति, वृहस्पति स्मृति एवं पराशर स्मृति प्रमुख है। इन स्मृतियों से हमें तत्कालीन सामाजिक संगठन, सिद्धान्तों, नियमों, प्रथाओं, रीति-रिवाजों आदि की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
सूत्र साहित्य-
सूत्र साहित्य से तत्कालीन धार्मिक तथा सामाजिक अवस्था के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है। सूत्र साहित्य तीन भागों में विभक्त है। श्रौत सूत्र, गृहय सूत्र व धर्म सूत्र। इनमें श्रौत सूत्र का संबंध ब्राहमणों के ग्रंथों में वर्णित यज्ञों से है। गृह सूत्र में गृहस्थ से संबंध रखने वाले संस्कारों, कर्मकाण्डों तथा मौलिक कर्तव्यों का वर्णन किया गया है। धर्म सूत्र में राजनैतिक, वैधानिक, सामाजिक व्यवस्था का वर्णन किया गया है।
रामायण-महाभारत
वैदिक साहित्य में रामायण एवं महाभारत नामक दो महाकाव्य महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इसमें रामायण काव्य की रचना महर्षि बाल्मीकि ने की थी। यह भारतीय संस्कृति का महानतम ग्रंथ है। इसमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म, कर्तव्य, व्यवहार तथा आचरण के आदर्श नियम हैं। इसमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्श चरित्र का चित्रण किया गया है। महाभारत की रचना वेदव्यास ने की थी। इसमें कौरवों तथा पांडवों के जीवन को धार्मिक, नैतिक तथा ऐतिहासिक रूप में प्रस्तुत किया गया है।

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