भारतीय दर्शन व मूल

दर्शन

न्‍याय दर्शन प्रमाण, प्रमेय सिद्धान्त, प्रयोजन, संशय, जल्प, छल, वितंडा, हेत्वा भास आदि सोलह पदार्थों की व्याख्या करता है। इनके रहस्यों को ज्ञात करने पर अंतिम पुरुषार्थ मोक्ष प्राप्त होने की स्थिति बताता है। न्याय दर्शन से ही संबंधित वैशेषिक दर्शन भौतिक जगत की व्याख्या करता है। द्रव्य, गुण, कर्म, सामन्य, विशेष एवं अभाव इन पदार्थों की व्याख्या करता है। पूर्व मीमांसा दर्शन कर्मों पर जोर देते हुए जीवन में करने योग्य समस्त कर्मों का विस्तृत विवेचन करता है। वेदान्त दर्शन जीव, ब्रह्म, माया आदि पदार्थों की व्याख्या करते हुए एक ही सूक्ष्म ब्रह्म में सबको समाहित करता है। अत: वेदान्त दर्शन की विशेषता अन्य दर्शनों की अपेक्षा अत्यंत उच्च है। आध्यात्मिक जगत में ये सभी अमूल्य निधि हैं। इनमें प्रवृत्त कोई भी विचारशील व्यक्ति अपार आनंद का अनुभव करते हुए जीवन व्यतीत करता है। इस क्षेत्र के लोगों को अन्य किसी विषय की समस्या बाधित नहीं कर सकती। संतोष सदैव इनके साथ रहता है। सांख्य दर्शन दर्शनों में अत्यंत सरल है तथा विवेचनीय पदार्थों का विवेचन इतनी सरलता से करता है कि जिज्ञासा रखने वाला व्यक्ति आसानी से समझ जाता है। दैहिक, दैविक, भौतिक तीन प्रकार के तापों को हटाने के लिए सांख्य दर्शन का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। इसमें 25 तत्वों का वर्णन हुआ है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, वाक, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, चक्षु, श्रोत, घ्राण, रचना, त्वक, मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति व पुरुष ये तत्व हैं। इन्हीं का जो ज्ञान करता है वह मुक्त होता है।

योग शास्त्र उक्त 25 तत्वों के साथ ही ईश्वर को शामिल कर लेता है।

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