ज्योतिष शास्त्र: वेदों का नेत्र

ज्योतिष शास्त्र



ज्योतिष शास्त्र को वेदों का नेत्र का कहा गया है। सिद्धान्त, गणित एवं होरा के भेद से यह तीन प्रकार का होता है। आकाशीय ज्योतिर्पिण्डों का यथार्थ अध्ययन करते हुए सूर्यादि ग्रहों का प्रत्येक पार्थिव पदार्थों में प्रभाव बताता है। ग्रह्यैर्व्याप्त जगतसर्वम् त्रैलोक्यं सचराचरम्। चराचर पूरे जगत को व्याप्त करता है। आकाशीय ग्रह पिण्डों का प्रभाव पृथ्वी के सभी पदार्थों में बताया गया है। जन्म कुण्डली, प्रश्न कुण्डली एवं नष्ट कुण्डली के अध्ययन से यथार्थ फलादेश करना, भविष्य में आने वाली दैवीय आपदाओं के संबंध में ज्योतिष शास्त्र से ज्ञान हासिल होता है।

टिप्पणियाँ