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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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इस्लामी महीनों में पहला महीना मोहर्रम है। इस महीने की 10 तारीख को इस्लामी तारीख का एक अहम वाकया हुआ जिसका तजकरा हर साल सारे जमाने में होता है। उस वाकए में मजलूम की शख्सियत पर जिस कदर आंसू बहाए जाते हैं, इतिहास के किसी वाकए में आज तक उतने आंसू नहीं बहाए गए।
यह बातें शहर-ए- काजी मुफ्ती मौलाना वलीउल्लाह ने (तारीखुलउममवमलूक जिल्द 6 पेज 220) का हवाला देते हुए कही। उन्होंने कहा कि वाकया ये हुआ था कि उस वक्त के बादशाह यजीद के दौर में सारी पब्लिक को ये हुक्म दे दिया गया था कि हमारी हुकूमत को पूरी तरह से तस्लीम कर लें। लेकिन इस्लामी कानून के लिहाज से ये हुकूमत कानून-ए-खिलाफत पर नहीं थी। इस वास्ते इमाम हुसैन ने उसको तस्लीम नहीं किया। इसके लिए उनको धोखे से बुलाया गया और उनके सामने यह बात रख दी गई कि आप हुकूमत को तस्लीम कर लें। इमाम हुसैन ने पहले तो चाहा कि जंग टल जाय लेकिन कुछ लोगों ने ये न चाहा। पहले तो इमाम हुसैन ने ये कहा कि मुझे मदीना वापस जाने दो या फिर मुझे यजीद से बात करने दो या फिर मुझे छोड़ दो मैं किसी मुस्लिम मुल्क में चला जाऊं। लेकिन उवैदुल्लाइबनेजेयाद ने उनको मजबूर किया और अपने फौजियों को हुक्म दिया कि कूबत के जरिए उनको इस बात पर राजी किया जाय कि यजीद की हुकूमत सही है। इसके नतीजे में कर्बला की जंग हुई। इमाम हुसैन के साथ 72 उनके अपने लोग, 45 सवार और 100 पियादा साथी थे। इस जंग में बहुत से ऐसे हालात हुए जिसपर इंसानियत शर्मिंदा हो जाती है। इसमें सबसे ज्यादा शरारत उवैदुल्लाइब्नेजेयाद की हठधर्मी और सत्ता की लालच की वजह से हुई। अगरचे बहुत से लिखने वालों ने कुछ बढ़ा-चढ़ा के भी लिखा है लेकिन जंग तो फिर जंग है। तकलीफदेह बातों का वजूद ही कुल होता है। बात असल यह है कि इमाम हुसैन की चाहत यह थी कि इस्लामी कानून के मुताबिक खिलाफत के तर्ज पर लोगों से राय लेकर हाकिम चुना जाय, लेकिन यजीद के मामले में ऐसा नहीं हुआ बल्कि उनके वालिद ने एलान कर दिया कि मेरे बाद मेरा लड़का यजीद हाकिम होगा। जिससे मजहब-ए-इस्लाम में खिलाफत की बजाय बादशाहत जन्म पा गई। जिसकी वजह से एक आदमी की चाहत सारे इंसानों पर जबरदस्ती ठूस दी जाती है। जिसको मजहब-ए-इस्लाम में कोई पसंद नहीं करेगा। इस वजह से बादशाहत की बुराई से जो इस्लामी कानून को धक्का पहुंचा और इंसानियत के लिए एक काला दिन हुआ, जिसकी वजह से इमाम हुसैन और उनके साथी इस पर राजी न हुए और बेसरोसामानी की वजह से जंग हुई और उनके सारे साथी एक जालिम हुक्मरान के जुल्म के शिकार हुए। आज सारे अलम में इस दास्ताने जालिम-ओ-मजलूम की याद करके उस पर दु:ख का इजहार किया जाता है ताकि आने वाली नस्लों को इस बात का सबक मिले कि मजहब-ए-इस्लाम में मसवरे के इंतजाम से जो हुकूमत बने उसमें कानून की पूरी पूरी ताबेदारी हो और डिक्टेटर बनकर अपनी मर्जी का कानून चलाना बुरी बात है। 10वीं मोहर्रम की याद अच्छाई और बुराई के दरम्यान होने वाली जंग की दास्तान बन जाती है। और ये लोगों को सबक दिया कि अच्छाई के लिए गर्दन कटा देना, सबकुछ कुर्बान कर देना अच्छाई है और इज्जत है तथा अपने गढ़े हुए कानून को लोगों पर थोपना बुराई है।
keyword: islam, moharram
यह बातें शहर-ए- काजी मुफ्ती मौलाना वलीउल्लाह ने (तारीखुलउममवमलूक जिल्द 6 पेज 220) का हवाला देते हुए कही। उन्होंने कहा कि वाकया ये हुआ था कि उस वक्त के बादशाह यजीद के दौर में सारी पब्लिक को ये हुक्म दे दिया गया था कि हमारी हुकूमत को पूरी तरह से तस्लीम कर लें। लेकिन इस्लामी कानून के लिहाज से ये हुकूमत कानून-ए-खिलाफत पर नहीं थी। इस वास्ते इमाम हुसैन ने उसको तस्लीम नहीं किया। इसके लिए उनको धोखे से बुलाया गया और उनके सामने यह बात रख दी गई कि आप हुकूमत को तस्लीम कर लें। इमाम हुसैन ने पहले तो चाहा कि जंग टल जाय लेकिन कुछ लोगों ने ये न चाहा। पहले तो इमाम हुसैन ने ये कहा कि मुझे मदीना वापस जाने दो या फिर मुझे यजीद से बात करने दो या फिर मुझे छोड़ दो मैं किसी मुस्लिम मुल्क में चला जाऊं। लेकिन उवैदुल्लाइबनेजेयाद ने उनको मजबूर किया और अपने फौजियों को हुक्म दिया कि कूबत के जरिए उनको इस बात पर राजी किया जाय कि यजीद की हुकूमत सही है। इसके नतीजे में कर्बला की जंग हुई। इमाम हुसैन के साथ 72 उनके अपने लोग, 45 सवार और 100 पियादा साथी थे। इस जंग में बहुत से ऐसे हालात हुए जिसपर इंसानियत शर्मिंदा हो जाती है। इसमें सबसे ज्यादा शरारत उवैदुल्लाइब्नेजेयाद की हठधर्मी और सत्ता की लालच की वजह से हुई। अगरचे बहुत से लिखने वालों ने कुछ बढ़ा-चढ़ा के भी लिखा है लेकिन जंग तो फिर जंग है। तकलीफदेह बातों का वजूद ही कुल होता है। बात असल यह है कि इमाम हुसैन की चाहत यह थी कि इस्लामी कानून के मुताबिक खिलाफत के तर्ज पर लोगों से राय लेकर हाकिम चुना जाय, लेकिन यजीद के मामले में ऐसा नहीं हुआ बल्कि उनके वालिद ने एलान कर दिया कि मेरे बाद मेरा लड़का यजीद हाकिम होगा। जिससे मजहब-ए-इस्लाम में खिलाफत की बजाय बादशाहत जन्म पा गई। जिसकी वजह से एक आदमी की चाहत सारे इंसानों पर जबरदस्ती ठूस दी जाती है। जिसको मजहब-ए-इस्लाम में कोई पसंद नहीं करेगा। इस वजह से बादशाहत की बुराई से जो इस्लामी कानून को धक्का पहुंचा और इंसानियत के लिए एक काला दिन हुआ, जिसकी वजह से इमाम हुसैन और उनके साथी इस पर राजी न हुए और बेसरोसामानी की वजह से जंग हुई और उनके सारे साथी एक जालिम हुक्मरान के जुल्म के शिकार हुए। आज सारे अलम में इस दास्ताने जालिम-ओ-मजलूम की याद करके उस पर दु:ख का इजहार किया जाता है ताकि आने वाली नस्लों को इस बात का सबक मिले कि मजहब-ए-इस्लाम में मसवरे के इंतजाम से जो हुकूमत बने उसमें कानून की पूरी पूरी ताबेदारी हो और डिक्टेटर बनकर अपनी मर्जी का कानून चलाना बुरी बात है। 10वीं मोहर्रम की याद अच्छाई और बुराई के दरम्यान होने वाली जंग की दास्तान बन जाती है। और ये लोगों को सबक दिया कि अच्छाई के लिए गर्दन कटा देना, सबकुछ कुर्बान कर देना अच्छाई है और इज्जत है तथा अपने गढ़े हुए कानून को लोगों पर थोपना बुराई है।
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