भारतीय दर्शन में देश-काल विचार

नैतिक तथा आध्यात्मिक विचारों के साथ-साथ भारतीय दर्शनों में यह भी दर्शाया गया है कि देश और काल अनादि और अत्यंत विशाल हैं। इसका प्रभाव भारतीय दर्शनों के नैतिक तथा आध्यात्मिक विचारों पर बहुत अधिक पड़ा है। पाश्चात्य देशों के कुछ लोगों का मत था कि संसार सृष्टि प्राय: छह हजार वर्ष पूर्व हुई तथा केवल मनुष्य के लिए ही हुई है। किन्तु यह मत अत्यंत संकीर्ण है। इस मत के अनुसार मनुष्य को अधिक महत्व दे दिया गया। जीव विज्ञान के विद्वानों द्वारा इसका खंडन हो जाता है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार संसार के सभी जीवों की सृष्टि एक साथ नहीं हुई है, वरन उसका क्रमिक विकास हुआ है। आधुनिक जीव विज्ञान के अनुसार संसार के सभी जीवों की उत्पत्ति में लाखों वर्ष लगे हैं। विश्व विस्तृत व व्यापक है। निखिल ब्रह्माण्ड में सूर्य एक कण मात्र है। पृथ्वी उस कण के दस लाख भागों में एक भाग सी है। आधुनिक विद्वानों का कथन है कि आकाश में जो वाष्पपुंज दृष्टिगोचर होता है, उसके एक-एक कण से एक-एक सौ करोड़ सूर्यों की सृष्टि हो सकती है। देश-काल की इस विशालता को समझने में हमारी कल्पना पराभूत हो जाती है। पुराणों में भी ऐसा ही वर्णन आया है। विष्णु पुराण में विश्व की वृहत्ता का विशद वर्णन किया गया है। इसके अनुसार पृथ्वी एक लोक है। चौदह लोकों का एक ब्रह्माण्ड होता है, इन लोकों के मध्य करोड़ों ब्रह्माण्ड सम्मिलित हैं। आधुनिक वैज्ञानिकों की तरह भारतीय भी काल का वर्णन साधारण लौकिक ढंग से नहीं करते थे। सृष्टि काल की माप के लिए ब्रह्मा का एक दिन मानदंड माना गया है। उनका एक दिन 1000 युगों अर्थात 432000,000 वर्षों तक कायम रहता है। सृष्टि का अंत होने पर ब्रह्मा की रात्रि का आरंभ होता है। इसे प्रलय कहते हैं। इस तरह के रात-दिन अर्थात सृष्टि-लय अनादि काल से होते आ रहे हैं। सृष्टि का आदि निर्णय नहीं हो सकता। जो भी समय इसके लिए निर्णय किया जाएगा, वह संदिग्ध होगा। क्योंकि उससे पूर्व समय की कल्पना की जा सकती है और तब क्या था? यह प्रश्न भी उठ सकता है, और कुछ नहीं रहने से शून्य से संसार की उत्पत्ति की कल्पना हम नहीं कर सकते। अत: भारतीय पंडित सृष्टि को अनादि मानते हैं। वर्तमान सृष्टि से पर्व अनेक सृष्टियां हुई हैं तथा अनेक प्रलय भी हुए हैं। इसे ऐसे कह सकते हैं कि वर्तमान सृष्टि का आरंभ अनेकों सृष्टियों और प्रलय के बाद हुआ है। चूंकि सृष्टि और प्रलय का क्रम अनादि है, इसलिए आदि सृष्टि का काल निरूपण बिल्कुल व्यर्थ है। किसी अनादि क्रम में आदि का अन्वेषण सर्वदा निरर्थक होता है। क्योंकि अनादि में आदि का अस्तित्व ही नहीं रहता है। अनादि विश्व की विशालता की दृष्टि से भारतीय विद्वानों ने पृथ्वी को अत्यंत नगण्य माना है। सांसारिक जीवन तथा लौकिक वैभव को भी नश्वर और महत्वहीन समझा है। अनंत आकाश में पृथ्वी एक बिन्दु है। जीवन मानों काल समुद्र में एक छोटी सी लहर है। इस काल समुद्र में जीवन रूपी अनेक लहरियां आती हैं और जाती हैं, किन्तु विश्व की दृष्टि से इसका कोई विशेष महत्व नहीं है। शताब्दियों तक कायम रहने वाली सभ्‍यता भी कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। इस भूतल पर एक सतयुग ही नहीं हुआ है। सृष्टि और प्रलय के अनादि क्रम में न जाने कितने सतयुग आए हैं। सतयुग के बाद त्रेता, द्वापर और कलियुग भी आए हैं। काल चक्र के साथ- साथ सभ्‍यता का विकास और विनाश, उत्थान और पतन होता रहता है। ऐसा भारतीय चिंतकों का मत है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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