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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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योग धर्म का विज्ञान है। ओशो कहते हैं कि पतंजलि धर्म के पहले वैज्ञानिक हैं। उन्होंने धर्म को वैज्ञानिक आधार दिया। पहली बार धर्म को प्रयोगधर्मी आधार दिया गया। इसके पहले धर्म मात्र आस्था व विश्वास की चीज थी। श्रद्धा की चीज थी। जिसे हम जानते नहीं, जिसका हमें कोई स्वाद नहीं, जिसकी हमने कोई झलक नहीं देखी, उसपर विश्वास, आंख मूंदकर विश्वास, आंख मूंदकर आस्था। यही आगे चलकर विवेकहीनता या विवेक में गिरावट का कारण बना। पतंजलि ने कुछ सूत्र दिए। जिनका प्रयोग कर निश्चित परिणामों पर पहुंचा जा सकता था। उन्हें योग कहते हैं। योग का अर्थ होता है जोड़। अर्थात आत्मा-परमात्मा जिस विधि से जुड़ सके वह योग। योग जोड़ता है। आत्मा को परमात्मा से। जीव को ब्रह्म से। यानी योग के सहारे मनुष्य अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। ओशो के शब्दों में अपनी परम खिलावट को प्राप्त कर सकता है। पतंजलि ने इसके लिए आठ सीढ़ियां बनार्इं। ताकि मनुष्य धीरे-धीरे सहज रूप से सीढ़ियां चढ़ते हुए परमात्मा तक पहुंच सके यानी समाधि की अवस्था तक पहुंच सके। ये सीढ़ियां हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि। इन आठों के भी कई चरण हैं। यम के पांच चरण हैं- अहिंसा, सत्य, आस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। इसी प्रकार नियम के भी पांच चरण हैं- शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश प्रणिधान। आसन में कई आसन हैं, जैसे ब्रजासन, पद्मासन, सुखासन आदि। लेकिन मनुष्य जिसमें सुख पूर्वक देर तक ध्यान के लिए बैठ सके, वही सर्वोत्तम है, इसके लिए ज्यादातर योगाचार्य सुखासन की सलाह देते हैं कि सुखासन का प्रयोग करें, इस आसन में पालथी मारकर कर सहजता पूर्वक देर तक बैठा जा सकता है। प्राणायाम में भी कई प्राणायाम हैं, जैसे भस्त्रिका, अनुलोम-विलोम, कपालभांति, भ्रामरी आदि। इनका प्रयोग सांसों की गति के लिए किया जाता है। इससे अधिक से अधिक प्राणवायु भीतर जाती है और भीतर का कचरा यानी कार्बनडाई आक्साइड बाहर जाता है। प्राणवायु हमारे फेफड़ों में ताजी हवा भर देती है तथा उसके बहुत से बंद द्वार खोल देती है। यदि हम प्राणायाम नहीं करते हैं तो हमारे फेफड़े के बहुत सारे छिद्र बंद हो जाते हैं और आगे चलकर सांस की समस्या उत्पन्न हो सकती है। इतना ही नहीं सांसों का हमारे स्व से बहुत गहरा रिश्ता है। इस शरीर रूपी मंदिर में जहां हम रहते हैं, जहां हमारा मूल है, वहां तक सांसे जाती हैं और वहीं से फिर वापस लौटती हैं। इसलिए समाधि की यात्रा में सांसों पर नियंत्रण जरूरी हो जाता है। सांसें जितनी धीमी चलती हैं हम उतने ही अधिक शांत हो जाते हैं। हम जितने अधिक शांत होते हैं उतने ही अपने निकट पहुंचते हैं। प्रत्याहार के जरिए हम बाहर से कटकर अपने भीतर स्थिर होने लगते हैं। ओशो कहते हैं कि ध्यान किया नहीं जा सकता। ध्यान में हुआ जा सकता है। जब विचार बंद हो जाते हैं तब जो बचता है यानी शून्य, वही ध्यान है। यह परम निर्विकार व निर्विचार अवस्था है। अंतिम अवस्था समाधि है। यह वह अवस्था है जब आत्मा परमात्मा से जुड़ जाती है। ऐसा जुड़ाव कि फिर कभी अलग नहीं हो सकती। यानी ऐसी अवस्था जहां जीव ब्रह्म हो जाता है। ऐसी अवस्था में ही पहुंच कर व्यक्ति कह सकता है- अहं ब्रह्मास्मि।
keyword: yoga
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा
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टिप्पणियाँ

सुन्दर प्रस्तुति,
जवाब देंहटाएंजारी रहिये,
बधाई !!