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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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व्रतों और पर्वों की हमारी लंबी और वैविध्यपूर्ण परंपरा में मकर संक्रांति का खास महत्व है। यह मूल रूप से सूर्योपासना का पर्व है। ऋग्वेद के अनुसार सूर्य ही इस जगत की आत्मा है। ज्योर्तिविदों के अनुसार सूर्य वर्ष पर्यंत क्रमश: 12 राशियों में संक्रमण करता है। एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य के प्रवेश को ही संक्रांति कहते है। इस क्रम में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है तो मकर संक्रांति का पर्व आता है।
इस पूण्यकाल में स्नानदान का खास महत्व है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस पर्व को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। जहां तक गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने की परम्परा है तो यह सदियों पुरानी है। किदंवतियों के अनुसार त्रेता युग में अवतारी व सिद्ध गुरु गोरक्षनाथ भिक्षाटन करते ही हिमांचल प्रदेश के कांगरा जिले में स्थित प्रसिद्ध ज्वाला देवी मंदिर गये। यहां देवी साक्षात प्रकट हुई और गुरु गोरक्षनाथ को भोजन के लिए आमंत्रित किया। आयोजन स्थल पर तामसी भोजन को देखकर गोरक्षनाथ ने कहा मैं तो भिक्षाटन कर उसी से जो चावल दाल मिलता है वहीं ग्रहण करता हूं। इस पर ज्वाला देवी ने कहा कि मैं गरम करने के लिए पानी चढ़ाती हूं। आप भिक्षाटन कर पकाने के लिए चावल-दाल ले आइये।
किवदंतियों के अनुसार गुरु गोरक्षनाथ यहां से भिक्षाटन करते हुए हिमालय की तलहटी में स्थित गोरखपुर आ गये। यहां उन्होंने राप्ती व रोहिणी नदी के संगम पर एक मनोरम जगह देखकर अपना अक्षय भिक्षापात्र वहां रखा और साधना में लीन हो गये। इस बीच खिचड़ी का पर्व आया एक तेजस्वी योगी को साधनारत देखकर उसके भिक्षापात्र में चावल-दाल डालने लगी, पर वह अक्षय पात्र भरने से रहा। इसे सिद्ध योगी का चमत्कार मानकर लोग अभिभूत और नतमस्तक हो गये। इसी समय से गोरखपुर में खिचड़ी चढ़ाने की परम्परा चली आ रही है। इस दिन हर साल नेपाल-बिहार व पूर्वांचल के दूर-दराज इलाकों से श्रद्धालु यहां खिचड़ी चढ़ाने आते है। इसके पूर्व वे मंदिर परिसर स्थित पवित्र सरोबर में स्नान करते है। बाद में गुरु गोरक्षनाथ में दर्शन कर उनको खिचड़ी चढ़ाते हैं। यहां का खिचड़ी मेला करीब एक महीने तक चलता है। इस दौरान पड़ने वाले हर रविवार और मंगलवार का अपना महत्व है। इन दिनों यहां पर भारी संख्या में श्रद्धालु आते है। भारतीय परम्परा में मकर संक्रांति को सर्वोत्तम काल माना गया है। हिंदू परम्परा में सारे शुभ कार्यों के शुरुआत के लिए इसे सर्वोत्तम काल माना गया है।
keyword: makar sankranti
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा
इस पूण्यकाल में स्नानदान का खास महत्व है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस पर्व को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। जहां तक गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने की परम्परा है तो यह सदियों पुरानी है। किदंवतियों के अनुसार त्रेता युग में अवतारी व सिद्ध गुरु गोरक्षनाथ भिक्षाटन करते ही हिमांचल प्रदेश के कांगरा जिले में स्थित प्रसिद्ध ज्वाला देवी मंदिर गये। यहां देवी साक्षात प्रकट हुई और गुरु गोरक्षनाथ को भोजन के लिए आमंत्रित किया। आयोजन स्थल पर तामसी भोजन को देखकर गोरक्षनाथ ने कहा मैं तो भिक्षाटन कर उसी से जो चावल दाल मिलता है वहीं ग्रहण करता हूं। इस पर ज्वाला देवी ने कहा कि मैं गरम करने के लिए पानी चढ़ाती हूं। आप भिक्षाटन कर पकाने के लिए चावल-दाल ले आइये।
किवदंतियों के अनुसार गुरु गोरक्षनाथ यहां से भिक्षाटन करते हुए हिमालय की तलहटी में स्थित गोरखपुर आ गये। यहां उन्होंने राप्ती व रोहिणी नदी के संगम पर एक मनोरम जगह देखकर अपना अक्षय भिक्षापात्र वहां रखा और साधना में लीन हो गये। इस बीच खिचड़ी का पर्व आया एक तेजस्वी योगी को साधनारत देखकर उसके भिक्षापात्र में चावल-दाल डालने लगी, पर वह अक्षय पात्र भरने से रहा। इसे सिद्ध योगी का चमत्कार मानकर लोग अभिभूत और नतमस्तक हो गये। इसी समय से गोरखपुर में खिचड़ी चढ़ाने की परम्परा चली आ रही है। इस दिन हर साल नेपाल-बिहार व पूर्वांचल के दूर-दराज इलाकों से श्रद्धालु यहां खिचड़ी चढ़ाने आते है। इसके पूर्व वे मंदिर परिसर स्थित पवित्र सरोबर में स्नान करते है। बाद में गुरु गोरक्षनाथ में दर्शन कर उनको खिचड़ी चढ़ाते हैं। यहां का खिचड़ी मेला करीब एक महीने तक चलता है। इस दौरान पड़ने वाले हर रविवार और मंगलवार का अपना महत्व है। इन दिनों यहां पर भारी संख्या में श्रद्धालु आते है। भारतीय परम्परा में मकर संक्रांति को सर्वोत्तम काल माना गया है। हिंदू परम्परा में सारे शुभ कार्यों के शुरुआत के लिए इसे सर्वोत्तम काल माना गया है।
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