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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी षट्तिला एकादशी के नाम से विख्यात है। यह 6 फरवरी दिन बुधवार को है। इस दिन सूर्योदय हृषिकेश पंचांग के अनुसार 6 बजकर 31 मिनट पर और एकादशी तिथि का मान 35 दंड 49 पला अर्थात रात्रि 8 बजकर 51 मिनट तक है। दशमी का वेध न होने से स्मार्तों और वैष्णव जन दोनों के लिए यह मान्य रहेगा। हेमाद्रि के मत से अन्य एकादशियों की तरह इस दिन से पूर्व एकभुक्त रहें और इस दिन प्रात:काल स्नान करके भगवान श्रीकृष्ण या भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करें। यह जप 8, 28, 108 या 1008 की संख्या में करें। दिन भर उपवास रखें। तिल मिले जल से स्नान करें। तिल का उबटन लगाएं। तिल का होम करें। तिल मिला जल पिएं। तिल का दान करें। तिल के बने मोदक का सेवन करें। ऐसा करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है। इस दिन काली गाय और काले तिल के दान का विशेष महत्व है। इस दिन रात्रि को जागरण और हवन किया जाता है। विधि पूर्वक चंदन, अगरजा, कपूर, नैवेद्य आदि से शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले श्री हरि की पूजा करें। भगवन्नाम का उच्चारण करते हुए कुम्हड़े, नारियल अथवा बिजौरे के फल से भगवान को विधिपूर्वक पूजन कर अर्घ्य प्रदान करें। अन्य सामग्रियों के अभाव में सुपाड़ी द्वारा पूजन कर अर्घ्य दिया जा सकता है। इस दिन किसी विद्वान वेदपाठी ब्राह्मण की पूजा का भी विधान है। व्रती को चाहिए कि जल का घड़ा दान करे। इस दिन तिल से भरे पात्र का भी दान करना चाहिए।
महात्म्य
प्राचीन काल में भगवान की परम भक्त एक ब्राह्मणी थी। वह उपवास व्रत रखती थी। कठिन व्रत, पति सेवा व गृहस्थी संभालने के कारण उसका शरीर सूख गया था किन्तु अपने जीवन में किसी को एक दाना भी दान नहीं की थी। भगवान एक दिन कपाली का रूप धारण कर उससे भिक्षा मांगने आए परन्तु उसने उन्हें भी कुछ नहीं दिया। अंत में कपाली के ज्यादा बड़बड़ाने से उसने मिट्टी का एक ढेला दे दिया तो कपाली रूप भगवान उसी से प्रसन्न हो गए और ब्राह्मणी को बैकुण्ठ का वास दिया। नारायण की आज्ञा से वह ब्राह्मणी षट्तिला एकादशी का व्रत की और उसके प्रभाव से उसे सब कुछ मिला।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजादनगर, रूस्तयमपुर, गोरखपुर
keyword: khattila-ekadashi
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा
महात्म्य
प्राचीन काल में भगवान की परम भक्त एक ब्राह्मणी थी। वह उपवास व्रत रखती थी। कठिन व्रत, पति सेवा व गृहस्थी संभालने के कारण उसका शरीर सूख गया था किन्तु अपने जीवन में किसी को एक दाना भी दान नहीं की थी। भगवान एक दिन कपाली का रूप धारण कर उससे भिक्षा मांगने आए परन्तु उसने उन्हें भी कुछ नहीं दिया। अंत में कपाली के ज्यादा बड़बड़ाने से उसने मिट्टी का एक ढेला दे दिया तो कपाली रूप भगवान उसी से प्रसन्न हो गए और ब्राह्मणी को बैकुण्ठ का वास दिया। नारायण की आज्ञा से वह ब्राह्मणी षट्तिला एकादशी का व्रत की और उसके प्रभाव से उसे सब कुछ मिला।
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