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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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1- सर्वमान्य नियम यह है कि मंगल दोष से ग्रसित कन्या का विवाह मंगल दोष ग्रसित वर से किया जाय तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
2-कन्या की कुण्डली में मंगल दोष है और वर की कुण्डली में उसी स्थान पर शनि हो तो मंगल दोष का परिहार स्वयंमेव हो जाता है।
3- यदि जन्मांग में मंगल दोष हो किन्तु शनि मंगल पर दृष्टिपात करे तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
4- मकर लग्न में मकर राशि का मंगल व सप्तम स्थान में कर्क राशि का चंद्र हो तो मंगल दोष नहीं रहता है।
5- कर्क व सिंह लग्न में भी लग्नस्थ मंगल केन्द्र व त्रिकोण का अधिपति होने से राजयोग देता है, जिससे मंगल दोष निरस्त होता है।
6- लग्न में बुध व शुक्र हो तो मंगल दोष निरस्त होता है।
7- मंगल अनिष्ट स्थान में है और उसका अधिपति केद्र व त्रिकोण में हो तो मंगल दोष समाप्त होता है।
8- आयु के 28वें वर्ष के पश्चात मंगल दोष क्षीण हो जाता है। ऐसा कहा जाता है किन्तु अनुभव में आया है कि मंगल अपना कुप्रभाव प्रकट करता ही है।
9- आचार्यों ने मंगल-राहु की युति को भी मंगल दोष का परिहार बताया है।
10- कुछ ज्योतिर्विद कहते हैं कि मंगल गुरु से युत या दृष्ट हो तो मंगल दोष समाप्त हो जाता है किन्तु हजारों जन्मपत्रियों के अध्ययन व सतत शोध के आधार पर हमने जाना है कि गुरु की राशि में संस्थित मंगल अत्यंत कष्टकारक है, पापाक्रांत मंगल ने अपना कुप्रभाव प्रकट किया है। मंगल दोष से दूषित जन्मांगों का जन्मपत्री मिलान करके मंगल दोष परिहार जहां तक संभव हो करके विवाह करें तो दाम्पत्य जीवन सुखद होता है। वृश्चिक राशि में न्यून किन्तु मेष राशि का मंगल प्रबल घातक होता है। कन्या के माता-पिता को घबराना नहीं चाहिए। हमारे धर्मशास्त्रों ने व्रतानुष्ठान, मंत्र प्रयोग द्वारा मंगल दोष को शांत करने का उपाय बताया है। कुछ अनुष्ठान निज शोध के आधार भी हमने जातक-जातिका से कराए जिसके अनुकूल परिणाम मिले हैं।
11-यदि मंगल चतुर्थ अथवा सप्तम भावस्थ हो तथा क्रूर ग्रह से युक्त या दृष्ट न हो एवं इन भावों में मेष, कर्क, वृश्चिक अथवा मकर राशि हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है। किन्तु भगवान रामजी की जन्मकुण्डली में सप्तम भाव में उच्च के मंगल ने राजयोग तो दिया किन्तु सीताजी से वियोग भी हुआ,जबकि मंगल पर गुरु की दृष्टि थी।
12- कुण्डली मिलान में यदि मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, द्वादश भाव में हो व द्वितीय जन्मांग में इन्हीं भावों में से किसी में शनि स्थित हो तो मंगल दोष निरस्त हो जाता है।
13- चतुर्थ भाव का मंगल वृष या तुला का हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
14- द्वादश भावस्थ मंगल कन्या, मिथुन, वृष व तुला का हो तो मंगल दोष निरस्त हो जाता है।
15- वर की कुण्डली में मंगल दोष है व कन्या की जन्मकुण्डली में मंगल के स्थानों पर सूर्य, शनि या राहु हो तो मंगल दोष का स्वयमेव परिहार हो जाता है।
keyword: mangal dosh, mangalik dosh
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा
2-कन्या की कुण्डली में मंगल दोष है और वर की कुण्डली में उसी स्थान पर शनि हो तो मंगल दोष का परिहार स्वयंमेव हो जाता है।
3- यदि जन्मांग में मंगल दोष हो किन्तु शनि मंगल पर दृष्टिपात करे तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
4- मकर लग्न में मकर राशि का मंगल व सप्तम स्थान में कर्क राशि का चंद्र हो तो मंगल दोष नहीं रहता है।
5- कर्क व सिंह लग्न में भी लग्नस्थ मंगल केन्द्र व त्रिकोण का अधिपति होने से राजयोग देता है, जिससे मंगल दोष निरस्त होता है।
6- लग्न में बुध व शुक्र हो तो मंगल दोष निरस्त होता है।
7- मंगल अनिष्ट स्थान में है और उसका अधिपति केद्र व त्रिकोण में हो तो मंगल दोष समाप्त होता है।
8- आयु के 28वें वर्ष के पश्चात मंगल दोष क्षीण हो जाता है। ऐसा कहा जाता है किन्तु अनुभव में आया है कि मंगल अपना कुप्रभाव प्रकट करता ही है।
9- आचार्यों ने मंगल-राहु की युति को भी मंगल दोष का परिहार बताया है।
10- कुछ ज्योतिर्विद कहते हैं कि मंगल गुरु से युत या दृष्ट हो तो मंगल दोष समाप्त हो जाता है किन्तु हजारों जन्मपत्रियों के अध्ययन व सतत शोध के आधार पर हमने जाना है कि गुरु की राशि में संस्थित मंगल अत्यंत कष्टकारक है, पापाक्रांत मंगल ने अपना कुप्रभाव प्रकट किया है। मंगल दोष से दूषित जन्मांगों का जन्मपत्री मिलान करके मंगल दोष परिहार जहां तक संभव हो करके विवाह करें तो दाम्पत्य जीवन सुखद होता है। वृश्चिक राशि में न्यून किन्तु मेष राशि का मंगल प्रबल घातक होता है। कन्या के माता-पिता को घबराना नहीं चाहिए। हमारे धर्मशास्त्रों ने व्रतानुष्ठान, मंत्र प्रयोग द्वारा मंगल दोष को शांत करने का उपाय बताया है। कुछ अनुष्ठान निज शोध के आधार भी हमने जातक-जातिका से कराए जिसके अनुकूल परिणाम मिले हैं।
11-यदि मंगल चतुर्थ अथवा सप्तम भावस्थ हो तथा क्रूर ग्रह से युक्त या दृष्ट न हो एवं इन भावों में मेष, कर्क, वृश्चिक अथवा मकर राशि हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है। किन्तु भगवान रामजी की जन्मकुण्डली में सप्तम भाव में उच्च के मंगल ने राजयोग तो दिया किन्तु सीताजी से वियोग भी हुआ,जबकि मंगल पर गुरु की दृष्टि थी।
12- कुण्डली मिलान में यदि मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, द्वादश भाव में हो व द्वितीय जन्मांग में इन्हीं भावों में से किसी में शनि स्थित हो तो मंगल दोष निरस्त हो जाता है।
13- चतुर्थ भाव का मंगल वृष या तुला का हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
14- द्वादश भावस्थ मंगल कन्या, मिथुन, वृष व तुला का हो तो मंगल दोष निरस्त हो जाता है।
15- वर की कुण्डली में मंगल दोष है व कन्या की जन्मकुण्डली में मंगल के स्थानों पर सूर्य, शनि या राहु हो तो मंगल दोष का स्वयमेव परिहार हो जाता है।
आचार्य पवन राम त्रिपाठी, प्रवक्ता श्रीकाशी विश्वेश्वर संस्कृत महाविद्यालय मुंबई
keyword: mangal dosh, mangalik dosh
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टिप्पणियाँ

Nice post_but I wish the writing was a bit big.......it's not so legible! Please increase the font size:)
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
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