रूद्राक्ष और फल



पुराणों के अनुसार रूद्राक्ष शिवजी के नेत्र के जल बिन्दु हैं जो शिव स्वरूप ही हैं। रूद्राक्ष के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक धारियां खिंची होती हैं। इन्हें मुख कहा जाता है। इन्हीं धारियों के आधार पर एक मुख से चौदह मुख तक रूद्राक्ष फलते हैं। जिस रूद्राक्ष में स्वयं छिद्र होता है, चाहे वह किसी भी मुख का हो, अपने गुण-धर्म के आधार पर श्रेष्ठ होता है। बाकी के गौरी-शंकर रूद्राक्ष में छेद किया जाता है जो मध्यम होता है, ऐसे ही रूद्राक्ष ज्यादा उपलब्ध रहते हैं। रूद्राक्ष के मुख से उसकी उपयोगिता और स्वभाव का ज्ञान होता है। रूद्राक्ष धारण करने के उपरांत किसी भी प्रकार का कोई परहेज नहीं होता तथा प्रत्येक महिला, पुरुष व बच्चे इसे धारण कर सकते हैं।
रूद्राक्ष ब्लडप्रेसर को संतुलित रखता है, हृदय रोग वालों के हृदय को मजबूत करता है। जिसका दिल घबराता हो, कमजोरी से दिल धड़कता हो, चलने-फिरने में थकावट तथा जिनके दिमाग में तनाव, अशांति व अधिक सोच-विचार चलते हों, उनके लिए रूद्राक्ष धारण करना अति लाभदायक है। रूद्राक्ष वृद्ध होने की प्रक्रिया को धीमा करता है क्योंकि यह मनुष्य को अधिक स्वस्थ और खुशदिल बनाता है। यह परिवार के सदस्यों के मध्य विचारों का सामंजस्य बढ़ाता है और सहायक मित्रों का दायरा बढ़ाता है।
धारण विधि- रूद्राक्ष को रविवार या सोमवार को सूर्योदय के समय गला, भुजा या कमर पर आवश्यकता अनुरूप धारण किया जा सकता है। रूद्राक्ष किसी भी धातु की चेन (सोने या चांदी) अथवा लाल धागे में पहनना चाहिए। एक मुखी रूद्राक्ष को दोनों ओर से सोने की टोपियां लगाकर सोने की चेन में पहनना चाहिए।
एक मुखी रूद्राक्ष- एकमुखी रूद्राक्ष भगवान शिव का स्वरूप है। इसे धारण करने से सम्मान और उच्च पद की प्राप्ति होती है। यह राजनीति से संबंध रखने वाले व्यक्तियों के लिए उत्तम है। इसको धारण करने वालों में क्रोध और घृणा आदि खत्म हो जाती है और व्यक्ति मानसिक शांति का अनुभव करता है। शत्रुओं का नाश और मित्रों में वृद्धि होती है। घर में अटूट लक्ष्मी का वास होता है और व्यापार में सफलता मिलती रहती है।
दो मुखी रूद्राक्ष- यह रूद्राक्ष शिव-पार्वती का स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से व्यक्ति का मन और शरीर स्वस्थ रहता है। घर में पारिवारिक क्लेशों को दूर कर आपसी संबंधों में सामंजस्य बनाए रखता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार अगर आपका शयनकक्ष दक्षिण-पूर्व दिशा में है तो पति-पत्नी के आपसी मतभेद उनको तलाक तक खींच ले जा सकते हैं। रूद्राक्ष धारण करने से यह दोष समाप्त हो जाता है।
तीन मुखी रूद्राक्ष- यह रूद्राक्ष ब्रह्मा, विष्णु, महेश का स्वरूप माना गया है। यह व्यक्ति में वात, पित्त और कफ का संतुलन बनाए रखता है और व्यक्ति में बीमारी से लड़ने की शक्ति बढ़ाता है। इसे धारण करने से व्यक्ति का कारोबार में मन लगा रहता है और रात गहरी और अच्छी नींद आती है। उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ खुलते शयनकक्ष वाले व्यक्तियों को तीन मुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।
चार मुखी रूद्राक्ष- यह रूद्राक्ष ब्रह्मा का स्वरूप माना गया है। यह विद्यार्थियों और अध्ययन करने वालों के लिए शुभ है क्योंकि यह स्मरण शक्ति बढ़ाता है। यदि आपके घर के बीच में कोई वास्तुदोष हो तो घर के बीचो-बीच किसी दीवार के साथ 5 दानें चार मुखी रूद्राक्ष के टांग दीजिए, यदि घर का प्रत्येक व्यक्ति रूद्राक्ष धारण करे अति उत्तम।
पांच मुखी रूद्राक्ष- यह रूद्राक्ष परमेश्वर का स्वरूप माना गया है। यह व्यक्ति के हृदय और मन को शांत कर दिमाग को शीतल रखता है। इसे धारण करने से व्यक्ति के स्वास्थ्य और आयु में वृद्धि होती है।
छह मुखी रूद्राक्ष- यह स्वामी कार्तिकेय का स्वरूप माना गया है। यह स्मरण शक्ति की क्षमता को विकसित कर सीखने की प्रक्रिया को बढ़ाता है। स्त्री रोग, दमा, ब्लड प्रेसर आदि बीमारियों को दूर कर शरीर को स्वस्थ बनाता है।। जिन्दगी की प्रत्येक छोटी-बड़ी समस्याओं में विजय प्रदान करवाता है।
सात मुखी रूद्राक्ष- यह लक्ष्मी का स्वरूप है। सात मुखी रूद्राक्ष व्यापार में लाभ व वृद्धि करता है। नौकरी करने वाले व्यक्ति में तरक्की के रास्ते बनाता है। घर में सुख-शांति बनाए रखता है और अनावश्यक खर्चों को कम करता है।
आठ मुखी रूद्राक्ष- यह रूद्राक्ष गणेशजी का स्वरूप है। यह विरोधियों के विरोध और द्वेष को बदलकर उन्हें मित्र बनाता है। निरंतर उथल-पुथल और बाधाओं के सताए हुए व्यक्ति में आठ मुखी रूद्राक्ष आश्चर्यजनक परिणाम देने वाला होता है।
नौ मुखी रूद्राक्ष- यह रूद्राक्ष नौ दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। अनिष्ट ग्रहों की दशा-अन्तर्दशा में रक्षा करता है। गृहस्थ जीवन की समस्याओं को दूर कर आत्मबल में वृद्धि करता है। हृदय रोग व दमा रोग में लाभकारी है। व्यक्ति में नेतृत्व गुण बढ़ाकर साहस, यश और भाग्य में वृद्धि करता है।
दस मुखी रूद्राक्ष- यह भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। जिन व्यक्तियों के कक्ष का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में है उन्हें दस मुखी रूद्राक्ष जरूर पहनना चाहिए। यह रूद्राक्ष दसों दिशाओं में व्यक्ति के यश की वृद्धि करता है और राजनीतिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा बढ़ाता है।
एकादश मुखी रूद्राक्ष- यह रूद्र का स्वरूप माना गया है। यह रूद्राक्ष मन, बुद्धि तथा शरीर को निरोगी और बलिष्ठ बनाता है। अपने जीवन में संघर्षरत व्यक्तियाओं और मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों के लिए यह अनमोल है। मानसिक शांति देता है और व्यक्ति को प्रसन्न बनाए रखता है। दूसरे के मन की बात जान लेने के गुणों में वृद्धि करता है। अगर आपके मकान का मुख्य द्वार दक्षिण दिशा में है तो यह रूद्राक्ष आप जरूर धारण करें।
बारह मुखी रूद्राक्ष- यह रूद्राक्ष भगवान सूर्य का स्वरूप है। यह शादी-संबंधों में रुकावट को दूर कर आपसी प्रेम भाव को बढ़ाता है। गर्भपात को रोकता है और स्वस्थ संतान के जन्म में सहायक होता है। इसे धारण करने से व्यक्ति की महत्वाकांक्षाएं काफी उच्च होने लगती हैं एवं व्यक्ति के चेहरे पर खुशी उत्पन्न करता है।
तेरह मुखी रूद्राक्ष- यह रूद्राक्ष स्वर्ग के राजा इन्द्र का स्वरूप माना गया है। व्यापार में सफलता दिलाकर समाज में प्रतिष्ठा बढ़ाता है। इसे धारण करने से मन में सात्विक विचार आने लगते हैं और छल, कपट व धोखा देने आदि के विचार तिरोहित हो जाते हैं। रिश्तेदारों व संबंधियों में सम्मान होता है। नया कार्य व व्यापार शुरू करने से पहले तेरह मुखी रूद्राक्ष धारण करने से उसमें सफलता के अवसर बढ़ जाते हैं।
चौदह मुखी रूद्राक्ष- यह रूद्राक्ष भगवान शिव त्रिपुरारि का स्वरूप माना गया है। यह मन को शांत कर ब्लड प्रेसर को संतुलित रखता है। हृदय रोग, कैंसर, दमा आदि रोगों से लड़ने की शक्ति देता है। चौदह मुखी रूद्राक्ष रात को पानी में डाल कर रख दें। प्रात: उसे निकालकर वह पानी पीने से शरीर के अनेक रोगों में लाभ मिलता है। यह मन को एकाग्र कर पूजा-पाठ में मन लगाता है।
गौरी शंकर रूद्राक्ष- प्राकृतिक रूप से कभी-कभी रूद्राक्ष आपस में जुड़े रहते हैं जिन्हें गौरी शंकर के नाम से जाना जाता है। यह रूद्राक्ष भगवान शंकर तथा आद्यशक्ति मां पार्वती का स्वरूप माना गया है। यदि घर में किसी किस्म का कोई वास्तु दोष है तो उसकी शांति के लिए गौरीशंकर रूद्राक्ष घर में पूजा स्थान पर रख दें। यह मानसिक शांति, धन, वैभव व सफलता देता है। घर के वातावरण को शुद्ध और पवित्र बनाता है।
आचार्य पवन कुमार राम त्रिपाठी, प्रवक्ता श्रीकाशी विश्वे श्वमर संस्कृफत महाविद्यालय, मुंबई

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