सृष्टि की अनवरत परिर्वतन प्रक्रिया में निहित हैं शिव

शिव भारतीय धर्म (हिन्दू धर्म) के प्रमुख देवता हैं। ब्रह्मा और विष्णु के त्रिवर्ग में उनकी गणना होती है। पूजा, उपासना में शिव और उनकी शक्ति की ही प्रमुखता है। उन्हें सरलता की प्रतिमूर्ति माना जाता है। द्वादश ज्योर्तिलिंगों के नाम से इनके विशलकाय तीर्थ स्वरूप देवालय भी हैं। पूजा के लिए एक लोटा जल चढ़ा देना ही इनकी कृपा के लिए पर्याप्त है। संभव हो ते वेलपत्र भी चढ़ाए जा सकते हैं। फलों की अपेक्षा ये नहीं करते। न धूप, दीप, चंदन, पुष्प जैसे उपचार अलंकारों के प्रति इनका आकर्षण है। इस सृष्टि के प्राणी और सभी पदार्थ तीन स्थितियों से होकर गुजरते हैं- उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन। सृष्टि की उत्पादन प्रक्रिया को ब्रह्मा, अभिवर्धन को विष्णु और परिवर्तन को शिव कहते हैं। शिव को सृष्टि की अनवरत परिवर्तन प्रक्रिया में झांकते देखा जा सकता है। शिव प्रकृति क्रम के साथ गुंथकर पतझड़ के पीले पत्तों को गिराते हैं और वसंत के पल्लव व फूल खिलाते हैं। इसलिए उन्हें श्मशानवासी कहा जाता है। मरण भयावह नहीं है और न ही उसमें अशुचिता है। हर व्यक्ति को मरण के रूप में शिव सत्ता का ज्ञान बना रहे, इसलिए उन्होंने अपना डेरा श्मशान में डाला है। वह बिखरी भष्म को शरीर पर मल लेते हैं ताकि ऋतुओं का प्रभाव न पड़े। मृत्यु को जो भी जीवन के साथ गुंथा हुआ देखता है उसपर न तो आक्रोश के आतप का आक्रमण होता है और न ही भीरुता के शीत का। निर्विल्प निर्भय बना रहता है। शिव बाघ का चर्म धारण करते हैं, जीवन में ऐसे ही साहस और पौरुष की आवश्यकता है। शिव जब उल्लासविभोर होते हैं तो मुण्डों की माला धारण करते हैं, यह जीवन की अंतिम परिणति और सौगात है जिसे राजा हो या रंक समानता से छोड़ते हैं। न प्रबुद्ध ऊंचा रहता है और अनपढ़ नीचा। सभी एक सूत्र में पिरो दिए जाते हैं। यही समत्व योग है। शिव को नीलकण्ठ कहा जाता है। कथा है के समुद्र मंथन में जब सर्वप्रथम वारुणी और दर्प का विष निकला तो शिव ने उस हलाहल को अपने गले में धारण कर लिया, न उगला न पिया। उगलते तो वातावरण विषाक्त होता और पीने से पेट में कोलाहल मचता। मध्यवर्गी नीति अपनाई। शिक्षा यह है कि विषमता को न तो आत्मसात करो और न ही विक्षोभ उत्पन्न कर उसे फैलाओ। शिव का वाहन वृषभ है जो शक्ति का पुंज है, सौम्य और सात्विक है। ऐसी ही आत्माएं शिव तत्व से लदी रहती हैं और नंदीश्वर जैसा श्रेय पाती हैं। शिव का परिवार भूतों और अनगढ़ों का परिवार है। तात्पर्य है कि पिछड़ों, अपंगों, विक्षिप्त को हमेशा साथ लेकर चलने से ही सेवा, सहयोग का प्रयोजन बनता है। शिव के मस्तक पर चंद्रमा है जिसका अर्थ है शांति और संतुलन। चंद्रमा मन की मुदितावस्था का प्रतीक है। योगी का मन चंद्रमा की तरह उत्फुल और नि:शंक रहता है। चंद्रमा पूर्ण ज्ञान का प्रतीक भी है। शिव के तीन नेत्र हैं, तीसरा नेत्र ज्ञान चक्षु है। यह तृतीय नेत्र सृष्टि में स्रष्टा ने प्रत्येक व्यक्ति को दिया है। यह विवेक के रूप में जागृत रहता है। यह अपने आप में सशक्त और पूर्ण होता है और कामना के गहन प्रकोप इसका कुछ बिगाड़ नहीं पाते। यही शिव तत्व का ज्ञान।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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