वसंत ऋतु के आगमन की अभिनंदन तिथि है वसंत पंचमी

वसंत पंचमी 5 फरवरी को है। यह वसंत ऋतु के आगमन की अभिनंदन तिथि है। प्राचीन काल से यह वसंत महोत्सव अपूर्व उल्लास के साथ मनाया जाता रहा है। आरंभ में यह पूर्णत: ऋतु संबंधी महोत्सव था किन्तु बाद में इसके साथ धार्मिक कथाएं जोड़ दी गर्इं। वसंत पंचमी को श्री पंचमी भी गया है। इस दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है। साथ ही यह लक्ष्मीजी की आराधना का भी पर्व है। पुराणों के अनुसार इसी दिन सिंधु सुता रमा ने विष्णु के गले में जयमाला डालकर उनका वरण किया था। यह सृष्टि के पालक और वैभव की शक्ति के विवाह और मिलन का महोत्सव है। वसंत पर्व मनाने के वैज्ञानिक कारण भी हैं। यह पर्व हमें आहार-विहार में सही बदलाव कर लेने की सूचना देता है। वसंत आने के साथ ही हमारे रक्त में हल्का-हल्का ऐसा द्रव्य पैदा होने लगता है जिससे शरीर में नवीन जोश और चेतना का संचार होता है। इसलिए आयुर्वेदाचार्यों ने इस ऋतु को कामशक्ति बढ़ाने वाला कहा है। इस ऋतु में जो द्रव्य पैदा होता है वह हमारे काम तंतुओं को झंकृत करता है। आयुर्वेद के आचार्यों ने वसंत पर्व पर आम्र मंजरी (आम की कोपलें और बौर) के सेवन का उल्लेख करते हुए इसे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी बताया है। इसके सेवन से पतले अथवा खूनी दस्त, प्रमेह आदि रोगों का खतरा नहीं रहता है। पुराणों के अनुसार इस दिन पृथ्वी को वाक् शक्ति मिली थी। सरस्वतीजी का इसी दिन जन्म हुआ था इसलिए यह तिथि सरस्वती जयंती के रूप में भी मनाई जाती है। होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही प्रारंभ होता है। विद्यारंभ के लिए भी इसे सर्वश्रेष्ठ दिन माना जाता है।
इस दिन क्या करें?
प्रात:काल उठकर स्नान के बाद श्रीगणेशजी, कलश, नवग्रह, षोडशमातृका का सविधि पूजन के अनंतर रक्षाबंधन करें। तत्पश्चात दोनों हाथों में चावल व पुष्प लेकर पुस्तक पर या घट के ऊपर अथवा मिट्टी की मूर्ति स्थापित कर सरस्वतीजी का ध्यान और पूजन करें। नैवेद्य में मक्खन, दही, गुड़, मधु, श्वेत चावल का कण, भात, खीर, जौ और गेहूं के चूर्ण में घी मिलाकर बनाई गई पीठी, मिठाई, नारियल, नारियल का जल, मूली, अदरक, पका हुआ केला, श्रीफल व बेर आदि चढ़ाना चाहिए। इसके अतिरिक्त देश, काल के अनुसार जो भी मिल जाय उसी का भोग लगावें। वंसत पंचमी का व्रत नहीं होता केवल पूजन होता है। सरस्वती का पूजन यदि पुस्तक पर करें तो उत्तम अन्यथा घट के ऊपर सुवर्ण मूर्ति या सुपाड़ी रखकर करें। इसमें वरुण कलश के अतिरिक्त एक अन्य कलश का भी प्रयोग किया जाता है। एक दूसरी विधि के अनुसार लक्ष्मी सहित भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। इसी दिन नवान्न भी किया जाता है। कंपा देने वाली ठिठुरन के बाद आने वाला वसंत हमें संदेश देता है कि अंधकार कितना भी गहन क्यों न हो, छंट ही जाता है।
सरस्वतीजी का परिचय
ब्रह्मवैवर्त पुराण में सरस्वतीजी का परिचय श्रीकृष्ण ने दिया है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये परब्रह्म परमात्मा से संबंध रखने वाली, बुद्धि, विद्या एवं ज्ञान अधिष्ठात्री देवी हैं। संपूर्ण विद्याएं इन्हीं की स्वरूप हैं। मनुष्यों को बुद्धि, कविता, मेधा, प्रतिभा और स्मरण शक्ति इन्हीं की कृपा से प्राप्त होती है। संपूर्ण संगीत की संधि और ताल का कारण इन्हीं का स्वरूप है। ये शांत स्वरूपा हैं और हाथ में वीणा और पुस्तक लिए रहती हैं। ये स्फटिक की माला फेरती हुई भगवान के नामों का जप करती हैं। इनकी मूर्ति तपोमय है। ये तपस्वी जनों को उनके तप का फल देने के लिए तत्पर रहती हैं। सिद्धि और विद्या इन्हीं का स्वरूप है। ये सदा सिद्धि प्रदान करती हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 43‍0 बी आजादनगर, रूस्तयमपुर, गोरख्रपुर

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