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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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ब्रूनो इटली के नीला नगर में उत्पन्न हुए थे। इनका कार्यकाल ई. सन् (1548-1600) के मध्य था। पहले कैथोलिक पादरी बने किन्तु बाद में अपने विचारों के कारण कैथोलिक मत से असंतुष्ट होकर उसे छोड़ दिया और प्रोटेस्टेंट मत में गए किन्तु वह मत भी उन्हें आकर्षित नहीं कर सका। दोनों मतों से असंतुष्ट होने के कारण दोनों मतों के कोपभाजन बनकर फ्रांस, इंग्लैण्ड और जर्मनी आदि देशों में घूमते रहे। इटली लौटने पर धर्मान्ध पादरियों ने इन्हें रोम में सात वर्ष तक बंदी रखा और तब भी अपने विचारों पर दृढ़ रहने के कारण 17 फरवरी 1600 को इन्हें जीवित जला दिया गया।
ब्रूनो एक महान विचारक और भावुक कवि थे। पाइथेगोरस, प्लेटो, प्लोटाइनस और निकोलस के विचारों का इनपर पर्याप्त प्रभाव पड़ा। सबसे अधिक ये निकोलस के ऋणी हैं। निकोसल के विशिष्टाद्वैत और अद्वैत की विचारधाराओं को इन्होंने अधिक स्पष्ट करके पुष्ट किया। इनकी अद्वैत विचारधारा बाद में स्पिनोजा और विशिष्टाद्वैत विचारधारा लाइबनित्ज में विकसित हुई। ब्रूनो के अनुसार यह संपूर्ण चिदचिद्रूप विश्व ईश्वर का ही स्वरूप है। स्वयं ईश्वर ही जड़-चेतनमय विश्व के रूप में भाषित हैं। ईश्वर और विश्व एक ही है। विश्व की ईश्वर से भिन्न अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। विश्व ईश्वर के अंतर्गत है। विश्व ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है परन्तु विश्व ईश्वर को सीमित नहीं कर सकता। ईश्वर विश्व में अंतर्यामी और रहते हुए भी विश्व के पार हैं। विश्व उनका शरीर है। वे विश्व की आत्मा हैं। वे विश्व के पारगामी अनिर्वचनीय और अचिन्त्य भी हैं। अनिर्वचनीय और अचिन्त्य ईश्वर का साक्षात्कार निर्विकल्प अनुभूति द्वारा ही हो सकता है। मानवी सविकल्प बुद्धि द्वारा नहीं। बुद्धि अद्वैत का साक्षात्कार नहीं कर सकती। इसके लिए सर्वोच्च तत्व विशिष्टाद्वैत है। एक ही तत्व भेद की दृष्टि से विश्व प्रतीत होता है और अभेद की दृष्टि से ईश्वर। वस्तुत: बुद्धि भेद और अभेद को अलग नहीं कर सकती है। ईश्वर विश्व का स्वभाव है और वास्तविक अभिव्यक्ति भी। क्योंकि विश्व ईश्वर में से अपने आप निकल पड़ा है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि विश्व निकलकर ईश्वर के बाहर आ गया है। निकलने पर भी वह ईश्वर के अंदर ही निहित है। जो कुछ है, ईश्वर ही है और ईश्वर के बाहर कुछ नहीं है। विश्व और ईश्वर में अचिन्त्य तादात्म्य है। बू्रनो ने विराट और विश्व का नाम दिया है। विश्व, विश्वात्मा और पर ये तीनों अनंत हैं, इसे पूर्ण अनंत कहा है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर
keyword: bruno
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा
ब्रूनो एक महान विचारक और भावुक कवि थे। पाइथेगोरस, प्लेटो, प्लोटाइनस और निकोलस के विचारों का इनपर पर्याप्त प्रभाव पड़ा। सबसे अधिक ये निकोलस के ऋणी हैं। निकोसल के विशिष्टाद्वैत और अद्वैत की विचारधाराओं को इन्होंने अधिक स्पष्ट करके पुष्ट किया। इनकी अद्वैत विचारधारा बाद में स्पिनोजा और विशिष्टाद्वैत विचारधारा लाइबनित्ज में विकसित हुई। ब्रूनो के अनुसार यह संपूर्ण चिदचिद्रूप विश्व ईश्वर का ही स्वरूप है। स्वयं ईश्वर ही जड़-चेतनमय विश्व के रूप में भाषित हैं। ईश्वर और विश्व एक ही है। विश्व की ईश्वर से भिन्न अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। विश्व ईश्वर के अंतर्गत है। विश्व ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है परन्तु विश्व ईश्वर को सीमित नहीं कर सकता। ईश्वर विश्व में अंतर्यामी और रहते हुए भी विश्व के पार हैं। विश्व उनका शरीर है। वे विश्व की आत्मा हैं। वे विश्व के पारगामी अनिर्वचनीय और अचिन्त्य भी हैं। अनिर्वचनीय और अचिन्त्य ईश्वर का साक्षात्कार निर्विकल्प अनुभूति द्वारा ही हो सकता है। मानवी सविकल्प बुद्धि द्वारा नहीं। बुद्धि अद्वैत का साक्षात्कार नहीं कर सकती। इसके लिए सर्वोच्च तत्व विशिष्टाद्वैत है। एक ही तत्व भेद की दृष्टि से विश्व प्रतीत होता है और अभेद की दृष्टि से ईश्वर। वस्तुत: बुद्धि भेद और अभेद को अलग नहीं कर सकती है। ईश्वर विश्व का स्वभाव है और वास्तविक अभिव्यक्ति भी। क्योंकि विश्व ईश्वर में से अपने आप निकल पड़ा है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि विश्व निकलकर ईश्वर के बाहर आ गया है। निकलने पर भी वह ईश्वर के अंदर ही निहित है। जो कुछ है, ईश्वर ही है और ईश्वर के बाहर कुछ नहीं है। विश्व और ईश्वर में अचिन्त्य तादात्म्य है। बू्रनो ने विराट और विश्व का नाम दिया है। विश्व, विश्वात्मा और पर ये तीनों अनंत हैं, इसे पूर्ण अनंत कहा है।
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टिप्पणियाँ

http://www.cpx24.com/index.php?refi=febjen
जवाब देंहटाएंVery nice article Gajadharji!
जवाब देंहटाएंVery interesting.The mention of Spinoza & Liebnitz took me back to my philosophy classes.
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