सॉक्रेटीज ने ‘व्यवहार’ और ‘परमार्थ’ को स्पष्ट किया

सॉक्रेटीज के विचारों के साथ प्लेटो के विचार घुलमिल गए हैं। सामान्यों और विज्ञानों का सिद्धान्त, इन्द्रियानुभूति और विज्ञान का भेद, विशुद्ध विज्ञान स्वरूप शिवतत्व और आत्मा की अमरता आदि सिद्धान्त मूल रूप में सॉक्रेटीज के सिद्धान्त कहे जा सकते हैं जिनका प्लेटो ने विकास किया। सॉक्रेटीज ने ‘व्यवहार’ और ‘परमार्थ’ के भेद को स्पष्ट किया है। सॉके्रटीज के ‘विज्ञानवाद’ या ‘सामान्यवाद’ का वर्णन प्लेटो ने ‘फीडो’ में किया है। विज्ञानवाद इन्द्रियानुभव और ज्ञान के भेद पर आधारित है। इन्द्रियानुभव व्यवहार है और ज्ञान परमार्थ है। इन्द्रियानुभव के विषय अनित्य, क्षणिक और मिथ्या हैं। ज्ञान के विषय नित्य, अपरिणामी और सत्य है। इन्द्रियों का स्तर परिणाम, गति औ अनित्यता का स्तर है। ज्ञान का स्तर सत, नित्य और परमार्थ का स्तर है। सॉके्रटीज कहते हैं कि असली वृत्ति या त्रिभुज तो हमारे ज्ञान में ही है। हम जो वृत्त या त्रिभुज खींचते हैं वे इस असली वृत्त या त्रिभुज के प्रतिस्वरूप मात्र हैं। असली वृत्त या त्रिभुज हम नहीं खींच सकते। इन्द्रियानुभव के विषय इन विज्ञानों के समान बनने का प्रयत्न करते हैं किन्तु ठीक उन जैसा नहीं बन सकते हैं। सॉक्रेटीज के अनुसार सामान्य हमारी बुद्धि की कल्पना नहीं है, उनकी वास्तविक सत्ता है। वस्तुत: असली सत्ता सामान्य की है। ये सामान्य या विज्ञान दिव्यलोक में रहते हैं। आत्मा अमर और दिव्य लोक की निवासी है जहां वह इन विज्ञानों का साक्षात करती है। जब आत्मा इस लोक में आकर शरीर से परिच्छिन हो जाती है तो उसका दिव्य ज्ञान क्षीण और मंद हो जाता है, फिर भी उसे दिव्य विज्ञान याद आते हैं और वह उनको ग्रहण करने का प्रयास करती है। किन्तु इस प्रयास में वह सफल नहीं हो पाती और उसके विज्ञान इन वास्तविक विज्ञानों के क्षीण प्रतिबिम्ब रह जाते हैं। इसका कारण इन्द्रियानुभूति है। हमारा सांसारिक ज्ञान इन्द्रियानुभूति पर निर्भर है और इन्द्रियानुभूति दिव्य विज्ञानों पर आवरण डाल देती है। इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके हम शरीर में रहते हुए उससे निर्लिप्त अशरीर बन सकते हैं और आत्म ज्ञान द्वारा दिव्य विज्ञानों का साक्षात्कार कर सकते हैं।
प्रश्न यह है कि क्या विज्ञानों का दिव्य लोक और इन्द्रियानुभव का यह लोक नितांत भिन्न है? क्या एक पूर्ण सत और दूसरा पूर्णत: असत है? इनमें कोई संबंध है भी या नहीं? सॉक्रेटीज का उत्तर है कि ये नितान्त भिन्न नहीं हो सकते। इन्द्रिय जगत अनित्य, क्षणिक, परिणामी और मिथ्या तो अवश्य है किन्तु नितान्त असत नहीं है। यदि जगत नितान्त असत होता तो प्रतीति का विषय भी नहीं बन सकता था। इसको मिथ्या कहने का अभिप्राय इतना ही है कि इसकी सत्ता अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। यह विज्ञान जगत के आलोक से ही प्रकाशित होता है। इसकी सत्ता इसलिए है कि इसमें विज्ञान अनुस्यूत है। यह छाया तो अवश्य है किन्तु यह विज्ञान रूपी काया की छाया है। बिना काया के छाया भी नहीं होती है। इन्द्रिय जगत की सत्ता विज्ञान जगत में भाग लेने के कारण है। इन्द्रिय जगत के पदार्थ विज्ञान जगत में जितना अधिक भाग लेते हैं, वे उतने ही अधिक सत हैं। इन्द्रिय जगत विज्ञान जगत का प्रतिबिम्ब है। जिन पदार्थों में यह प्रतिबिम्ब जितना अधिक स्पष्ट होता जाता है, उतने ही अधिक सत है। सत के व्यावहारिक न्यूनाधिक्य का तारतम्य सॉक्रेटीज को मान्य है। किन्तु एक समस्या और रह जाती है और वह है कि इस दिव्य विज्ञान जगत में विज्ञानों का परस्पर भेद। क्या ये दिव्य विज्ञान परस्पर भिन्न और पृथक ही रहते हैं या इनमें सांमजस्य और एकरूपता है? इसकी झलक ‘सिम्पोजियम’ में और इसका स्पष्टीकरण ‘रिपब्लिक’ में मिलता है। सॉक्रेटीज के इन दिव्य विज्ञानों में तारतम्य है। ये बिखरे हुए नहीं हैं, एक सूत्र में बद्ध है। यह सूत्र इन विज्ञानों का विज्ञान है। इस परम विज्ञान को ‘सिम्पोजियम’ में विशुद्ध सौन्दर्य और ‘रिपब्लिक’ में विज्ञान स्वरूप शिव तत्व कहा गया है। यह परम तत्व है और इसका साक्षात्कार मानव जीवन का परम लक्ष्य।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, गोरखपुर

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