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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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निकोलस (1401- 1461) एनआईसीएचओएलएएस का दर्शन मध्ययुग और आधुनिक युग के विचारों की संधि है। वे स्वयं पादरी थे और उन्हें पोप व चर्च की प्रभुता मान्य थी किन्तु वे निरंकुश सत्ता के उपासक नहीं थे। इनके मत से राजा की सत्ता प्रजा के लिए और पोप की सत्ता धर्म के लिए है। निरंकुशता को रोकने के लिए राजा की सत्ता प्रजा के प्रतिनिधियों की समिति द्वारा और पोप की सत्ता धार्मिक पादरियों की समिति द्वारा नियंत्रित रहनी चाहिए। निकोलस के दर्शन में ग्रीक दर्शन का प्रेम, गणित और भौतिक विज्ञान का अनुराग, व्यक्ति की महत्ता और स्वतंत्रता, सुन्दर भविष्य की आशा, बुद्धिवाद की प्रधानता, निरंकुशता का विरोध, आलोचनात्मक प्रणाली इत्यादि हैं। ये समस्त विशेषताएं उनकी धार्मिक श्रद्धा और रहस्यवाद के प्रेम से नियंत्रित हैं। निकोलस आॅफ कुसा महान दार्शनिक थे। इनके विचारों का प्रभाव ब्रूनो, स्पिनोजा, लाइबनित्ज, शेलिग और हेगेल पर पड़ा है। इनकी दार्शनिक महत्ता पूर्ण रूप से स्वीकृत नहीं हो पाई है। कारण यह है कि अपनी धर्मभीरुता के कारण जो विचार इसाई धर्म के प्रतिकूल हैं उनको वे विकसित नहीं कर सके। इनके दर्शन के पश्चात यूरोप को 125 वर्ष प्रतीक्षा करना पड़ा। ब्रूनो ने साहस पूर्वक धर्ममुक्त विचारों का उद्घोष किया। बाद में उसे कारावास की यंत्रणा दी गई और ब्रूनो को जीवित जला दिया गया, परन्तु उसने अपने विचारों से समझौता नहीं किया। अपने प्राणों को हंसते-हंसते बलिदान करने वाले ब्रूनो की ख्याति के आगे निकोलस की ख्याति ढक गई।
निकोलस के दर्शन में विशिष्टाद्वैत और अद्वैत का विलक्षण समन्वय है। ये इन दोनों को विरुद्ध न मानकर विशिष्टाद्वैत को अद्वैत का पूर्व रूप मानते थे। मानवी बुद्धि के लिए विशिष्टाद्वैत सर्वोच्च सिद्धान्त है क्योंकि हमारी बुद्धि तत्व के पूर्ण रहस्य को नहीं समझ सकती। तत्व का वास्तविक स्वरूप अनिर्वचनीय अद्वैत ही है, वहां वाणी और बुद्धि की गति नहीं रहती है। निकोलस के कुछ सिद्धान्त जैसे पृथ्वी सृष्टि का केन्द्र नहीं है और पृथ्वी घूमती है इत्यादि इसाई मत के प्रतिकूल हैं। फिर भी इसाई पादरी और श्रद्धालु जन निकोलस को सम्मान की दृष्टि से देखते रहे क्योंकि निकोलस स्वयं धर्मात्मा, ईसा मसीह के कट्टर भक्त और श्रद्धालु पादरी थे। पोप और चर्च के उपासक थे, यद्यपि कई पादरी उनके इन सिद्धान्तों से असंतुष्ट थे। उनके अद्वैतवाद को कुछ विद्वान भुला दिए और उनके विशिष्टाद्वैत को इसाई धर्म के कुछ विद्वानों ने स्वीकार कर लिया। निकोलस के विचारों का ज्यादा प्रभाव विविध स्तरों पर स्पिनोजा पर पड़ा है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तयमपुर, गोरखपुर
keyword: nicholas
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा
निकोलस के दर्शन में विशिष्टाद्वैत और अद्वैत का विलक्षण समन्वय है। ये इन दोनों को विरुद्ध न मानकर विशिष्टाद्वैत को अद्वैत का पूर्व रूप मानते थे। मानवी बुद्धि के लिए विशिष्टाद्वैत सर्वोच्च सिद्धान्त है क्योंकि हमारी बुद्धि तत्व के पूर्ण रहस्य को नहीं समझ सकती। तत्व का वास्तविक स्वरूप अनिर्वचनीय अद्वैत ही है, वहां वाणी और बुद्धि की गति नहीं रहती है। निकोलस के कुछ सिद्धान्त जैसे पृथ्वी सृष्टि का केन्द्र नहीं है और पृथ्वी घूमती है इत्यादि इसाई मत के प्रतिकूल हैं। फिर भी इसाई पादरी और श्रद्धालु जन निकोलस को सम्मान की दृष्टि से देखते रहे क्योंकि निकोलस स्वयं धर्मात्मा, ईसा मसीह के कट्टर भक्त और श्रद्धालु पादरी थे। पोप और चर्च के उपासक थे, यद्यपि कई पादरी उनके इन सिद्धान्तों से असंतुष्ट थे। उनके अद्वैतवाद को कुछ विद्वान भुला दिए और उनके विशिष्टाद्वैत को इसाई धर्म के कुछ विद्वानों ने स्वीकार कर लिया। निकोलस के विचारों का ज्यादा प्रभाव विविध स्तरों पर स्पिनोजा पर पड़ा है।
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