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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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खगोलविदों ने कुछ वर्ष पूर्व ‘ओफियूकस’ को 13वीं राशि के तौर पर शामिल करने का प्रस्ताव रखा था। क्योंकि इस राशि को सम्मिलित करने से खगोलीय अध्ययन में सुविधा रहेगी। परन्तु ज्योतिषियों ने इसका विरोध किया। सन 2011 में जनवरी मास की 16 तारीख को ‘ओफियूकस’ नामक तारामंडल को 13वीं राशि के तौर पर सम्मिलित किया गया है। तारों के इस समूह की बाहरी रेखाओं को यदि जोड़ दिया जाय तो उससे आकाश में एक शक्तिशाली मानव का चित्र उभरता है जो विशालकाय सांप (राहु-केतु) से लड़ रहा है। कुछ विद्वानों के अनुसार लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व बेबीलोन के रहने वाले ओफियूकस को 13वीं राशि के तौर पर सम्मिलित करना चाहते थे परन्तु 12 महीने के कैलेण्डर का हिसाब रखने के लिए उन्होंने ऐसा नहीं किया। 12 राशि के स्थान पर 13 राशि रखने का प्रस्ताव अमेरिका के खगोशास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफेसर पार्के कंकले ने किया। इस परिवर्तन का अधार ज्योतिष नहीं वैज्ञानिक है। वह है चंद्रमा के गुरुत्व बल के कारण पृथ्वी की धुरी में होने वाला बदलाव। पृथ्वी अपनी धुरी पर चक्कर लगाने के साथ-साथ लट्टू की तरह डोलती भी है। उसकी वजह से ध्रुव बिन्दु जिसे ध्रुव तारा अथवा नार्थ स्टार कहा जाता है, बदलता रहता है। इन दिनों जो ध्रुव तारा हमें दिखाई देता है वह ढाई हजार वर्ष पूर्व के बुद्ध, महावीर या बेबीलोन वासियों के समय का नहीं है। यही नहीं ढाई हजार वर्ष बाद हमारे ध्रुव तारे की जगह कोई दूसरा तारा ले लेगा। इस तरह पिछले ढाई हजार वर्षों मं पृथ्वी की धुरी के ओरिएंटेशन में काफी बदलाव आया है। इस तरह तारों की सीध में एक महीने का विचलन (शिफ्ट) पैदा हो गया है। खगोल वैज्ञानिक सभी तारा राशियों को एक महीने पीछे लाने के बाद 13वीं राशि के रूप में ओफियूकस को पेश कर राशिचक्र के कैलेण्डर को फिर से सम्मिलित करना चाहते हैं। यह समायोजन वसंत विषुव के अग्र गमन के कारण किया जाता है। इस कारण राशि चिन्हों की तिथियां बदल जाती हैं। इस परिवर्तन से उन लोगों को कुछ परेशानी हो सकती है जिनका जन्म 29 नवम्बर से 17 दिसम्बर के बीच नई राशि ओफियूकस में हुआ है।
राशियों की उत्पत्ति का विवरण: संसार की प्राचीन सभ्यताओं का आकाशीय पिण्डों से निकट का संबंध रहा है। उस समय प्रदूषण नहीं था और न ही इतना शोरगुल था। लोग रात भर तारों को आश्चर्यजनक भाव से निहारा करते थे और उसे समझने का प्रयास करते थे। अनेक तारा समूहों को जोड़कर उसमें तरह-तरह की आकृतियां नजर आती थीं जैसे पशु, पक्षी, मनुष्य आदि। प्राचीन सभ्यताओं ने तारों के समूह से बनने वाली विभिन्न आकृतियों को अलग-अलग तारामंडलों में विभक्त किया जिसे राशि कहा जाता है। दूसरी सदी तक मिश्र के खगोलविद टॉलेमी ने आकाश को 48 राशियों अथवा समूहों में बांटा था। सन 1600 से 1800 के बीच कोपरनिकस के बाद खगोदविदों ने कई धुंधले तारों को पुरानी राशियों से जोड़कर कई आधुनिक तारामंडल का नाम दिया है। वर्तमान में आकाश की वास्तविक सीमाओं के साथ 88 समूहों में बांटा गया है।
13वीं राशि व फलित ज्योतिष: इस तेरहवीं राशि के सच को भी समझने का प्रयास किया जाय क्योंकि इसका आधार वैज्ञानिक है। खगोल विज्ञान व ज्योतिष एक-दूसरे से संबंधित हैं। विश्व भर में आज 13वीं राशि ओफियूकस की चर्चा हो रही है और इस राशि में जन्मे लोगों के विषय में अनुसंधान हो रहे हैं। अभी इस राशि के बारे में बहुत कुछ जानना और समझना शेष है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 वी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर
keyword: jyotish
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा
राशियों की उत्पत्ति का विवरण: संसार की प्राचीन सभ्यताओं का आकाशीय पिण्डों से निकट का संबंध रहा है। उस समय प्रदूषण नहीं था और न ही इतना शोरगुल था। लोग रात भर तारों को आश्चर्यजनक भाव से निहारा करते थे और उसे समझने का प्रयास करते थे। अनेक तारा समूहों को जोड़कर उसमें तरह-तरह की आकृतियां नजर आती थीं जैसे पशु, पक्षी, मनुष्य आदि। प्राचीन सभ्यताओं ने तारों के समूह से बनने वाली विभिन्न आकृतियों को अलग-अलग तारामंडलों में विभक्त किया जिसे राशि कहा जाता है। दूसरी सदी तक मिश्र के खगोलविद टॉलेमी ने आकाश को 48 राशियों अथवा समूहों में बांटा था। सन 1600 से 1800 के बीच कोपरनिकस के बाद खगोदविदों ने कई धुंधले तारों को पुरानी राशियों से जोड़कर कई आधुनिक तारामंडल का नाम दिया है। वर्तमान में आकाश की वास्तविक सीमाओं के साथ 88 समूहों में बांटा गया है।
13वीं राशि व फलित ज्योतिष: इस तेरहवीं राशि के सच को भी समझने का प्रयास किया जाय क्योंकि इसका आधार वैज्ञानिक है। खगोल विज्ञान व ज्योतिष एक-दूसरे से संबंधित हैं। विश्व भर में आज 13वीं राशि ओफियूकस की चर्चा हो रही है और इस राशि में जन्मे लोगों के विषय में अनुसंधान हो रहे हैं। अभी इस राशि के बारे में बहुत कुछ जानना और समझना शेष है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 वी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर
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टिप्पणियाँ

is rashi ke bare mein adhik jankari milne par zaroor post karein
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