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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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19वीं शताब्दी में भारतीय समाज में घोर असमानता तथा अन्याय का बोलबाला था। भारतीय अनेक रूढ़ियों व आडम्बरों के कारण पतन की ओर उन्मुख हो रहे थे। ऐसे समय में स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में आर्य समाज की स्थापना कर उनका उद्धार किया। ब्रह्म समाज ने तो केवल बंगाल व उसके आसपास की अंग्रेजी पढ़ी-लिखी जनता को ही प्रभावित किया, आर्य समाज ने संपूर्ण भारत की जन साधारण जनता को प्रभावित किया।
स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 1824 में काठियावाड़ा के एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम मूलशंकर था। आप बचपन से ही धर्मप्रेमी तथा बड़ी विचारशील प्रकृति के थे। विवाह नहीं किया और 22 वर्ष की आयु में ही घर से निकल पड़े और संन्यास ले लिया। उनके गुरु स्वामी विरजानंद थे। दयानंद सरस्वती ने पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि अनेक दूरस्थ स्थानों का भ्रमण किया। इस भ्रमण का उद्देश्य शास्त्रार्थ और व्याख्यानों द्वारा वैदिक धर्म की श्रेष्ठ बातों का प्रचार करना था। उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना ‘सत्यार्थ प्रकाश’ है, जिसमें उन्होंने वेदों और वैदिक धर्म की सर्वोच्चता सिद्ध की है।
आर्य समाज ने धार्मिक सुधार के क्षेत्र में मूर्ति पूजा, बलि प्रथा तथा कर्मकाण्ड के विरुद्ध प्रचार किया। हिन्दू धर्म छोड़ चुके लोगों को हिन्दू धर्म में पुन: लौट आने के लिए प्रेरित किया। स्वामी जी छूआछूत को धर्म के विरुद्ध मानते थे। जातिगत भेदभाव दूर करने के लिए उन्होंने संस्थाओं की स्थापना की। बहु विवाह, बाल विवाह, पर्दा प्रथा के विरोध में जनमत तैयार किया। वेश्यावृत्ति के विरुद्ध कानून बनवाने का प्रयास किया। अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया। भारतीय पुनरुत्थान के इस महारथी की मृत्यु 1882 ई. में हो गई।
आर्य समाज के सिद्धान्त: ईश्वर एक है। वह निराकार, सर्वशक्तिमान, अजन्मा, निर्विकार, सर्वव्यापक, अजर-अमर तथा सृष्टिकर्ता है। वेद ईश्वर की वाणी हैं। वेदों की शिक्षाएं सत्य हैं, उन्हें पढ़ना तथा सुनना प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है। कर्म तथा पुनर्जन्म का सिद्धान्त वेदों के अनुकूल है। समस्त कार्यों में सत्य-असत्य का ध्यान रखना चाहिए। समस्त प्राणियों का कर्तव्य है कि वह अज्ञान का नाश और ज्ञान का प्रसार करे। पारस्परिक सबंध का आधार प्रेम, न्याय तथा धर्म होना चाहिए। विद्या की वृद्धि तथा अविद्या के नाश के लिए सदैव प्रयत्न करना चाहिए। प्रत्येक मानव को जन साधारण के कल्याण में ही अपना कल्याण समझना चाहिए। संपूर्ण विश्व की सामाजिक, शारीरिक तथा आध्यात्मिक उन्नति करना आर्य समाज का लक्ष्य है।
keyword: arya samaj
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा
स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 1824 में काठियावाड़ा के एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम मूलशंकर था। आप बचपन से ही धर्मप्रेमी तथा बड़ी विचारशील प्रकृति के थे। विवाह नहीं किया और 22 वर्ष की आयु में ही घर से निकल पड़े और संन्यास ले लिया। उनके गुरु स्वामी विरजानंद थे। दयानंद सरस्वती ने पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि अनेक दूरस्थ स्थानों का भ्रमण किया। इस भ्रमण का उद्देश्य शास्त्रार्थ और व्याख्यानों द्वारा वैदिक धर्म की श्रेष्ठ बातों का प्रचार करना था। उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना ‘सत्यार्थ प्रकाश’ है, जिसमें उन्होंने वेदों और वैदिक धर्म की सर्वोच्चता सिद्ध की है।
आर्य समाज ने धार्मिक सुधार के क्षेत्र में मूर्ति पूजा, बलि प्रथा तथा कर्मकाण्ड के विरुद्ध प्रचार किया। हिन्दू धर्म छोड़ चुके लोगों को हिन्दू धर्म में पुन: लौट आने के लिए प्रेरित किया। स्वामी जी छूआछूत को धर्म के विरुद्ध मानते थे। जातिगत भेदभाव दूर करने के लिए उन्होंने संस्थाओं की स्थापना की। बहु विवाह, बाल विवाह, पर्दा प्रथा के विरोध में जनमत तैयार किया। वेश्यावृत्ति के विरुद्ध कानून बनवाने का प्रयास किया। अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया। भारतीय पुनरुत्थान के इस महारथी की मृत्यु 1882 ई. में हो गई।
आर्य समाज के सिद्धान्त: ईश्वर एक है। वह निराकार, सर्वशक्तिमान, अजन्मा, निर्विकार, सर्वव्यापक, अजर-अमर तथा सृष्टिकर्ता है। वेद ईश्वर की वाणी हैं। वेदों की शिक्षाएं सत्य हैं, उन्हें पढ़ना तथा सुनना प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है। कर्म तथा पुनर्जन्म का सिद्धान्त वेदों के अनुकूल है। समस्त कार्यों में सत्य-असत्य का ध्यान रखना चाहिए। समस्त प्राणियों का कर्तव्य है कि वह अज्ञान का नाश और ज्ञान का प्रसार करे। पारस्परिक सबंध का आधार प्रेम, न्याय तथा धर्म होना चाहिए। विद्या की वृद्धि तथा अविद्या के नाश के लिए सदैव प्रयत्न करना चाहिए। प्रत्येक मानव को जन साधारण के कल्याण में ही अपना कल्याण समझना चाहिए। संपूर्ण विश्व की सामाजिक, शारीरिक तथा आध्यात्मिक उन्नति करना आर्य समाज का लक्ष्य है।
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टिप्पणियाँ

हमने सत्यार्थ प्रकाश पढी है. वैदिक धर्म में उन्होंने सुबह शाम हवन करना अनिवार्य बताया है. देखें चौथा समुल्लास.
जवाब देंहटाएं2 समय हवन न करने वाले को उन्होंने शूद्र घोषित कर दिया और क्षत योनि विधवा का पुनर्विवाह करना भी उन्होंने वेदानुसार पाप बताया है.
हवन करने के लिये गरीब के पास पैसे नहीं और अमीर के पास समय नहीं और विधवा विवाह न करे तो क्या करे ?
नतीजा यह हुआ कि आर्यसमाजी भी हवन नहीं करते और विधवा का पुनर्विवाह ही करते हैं.
सत्यार्थ प्रकाश में उन्होंने उन ग्रंथों की भी मज़ाक़ उड़ाई है जिनकी भाषा का भी उन्हें ज्ञान न था.
उनके बताये नियमों का पालन आर्य समाजियों ने उनके सामने भी न किया . इसीलिये उन्होंने कहा था कि
'मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ कि मुझे इस जन्म में सुयोग्य शिष्य नहीं मिलेगा। इसका प्रबल कारण यह भी है कि मैं तीव्र वैराग्यवश बाल्यकाल में माता पिता को छोड़कर सन्यासी बन गया था।' (युगप्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती, पृ. 121)
हम्म अच्छी जानकारी
जवाब देंहटाएंSwami Dayanand Saraswati ki soch se hamesha prabhavit raha hoon aaj unke bare mein aur adhik jaankar achcha laga
जवाब देंहटाएं