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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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होली पर्व के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। पुराणों में कई कथाओं का उल्लेख मिलता है। जहां इसे भक्त प्रहलाद और होलिका से जोड़ा जाता है वहीं कई स्थानों पर इसे राक्षसी ढोंढा व पूतना के वध से भी जोड़ा जाता है।
विष्णु पुराण की एक कथा के अनुसार प्रहलाद के पिता दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने तपस्या कर देवताओं से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि वह न तो पृथ्वी पर मरेगा न आकाश में, न दिन में मरेगा न रात में, न घर में मरेगा न बाहर, न अस्त्र से मरेगा न शस्त्र से, न मानव से मरेगा न पशु से। इस वर को प्राप्त करने के बाद वह स्वयं को अमर समझकर नास्तिक व निरंकुश हो गया। वह चाहता था कि उसका पुत्र प्रहलाद भगवान की आराधना छोड़ दे, परन्तु प्रहलाद इस बात के लिए राजी न थे। हिरण्यकश्यप ने उन्हें बहुत प्राणान्तक यातनाएं दी लेकिन वह परमात्मा की कृपा से हर बार बच निकले। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग से नहीं जलेगी, इसलिए उसने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रहलाद को लेकर आग में बैठ जाए। होलिका ने उन्हें अपने गोद लेकर जब आग में प्रवेश किया तो होलिका भष्म हो गई और प्रहलाद नारायण-नारायण कहते बाहर निकल आए। होलिका का अंत होने की खुशी में हम होली का पर्व मनाते हैं।
भविष्य पुराण की एक कथा के अनुसार सतयुग में रघु नामक एक प्रसिद्ध एवं कल्याणकारी राजा थे। उनके राज्य में सभी सुखी थे। एक दिन बहुत से लोग त्राहि-त्राहि करते हुए उनके द्वार पर आए और बोले महाराज ढोंढा नामक राक्षसी हमारे अबोध बच्चों को खा जाती है। राजा रघु ने ढोंढा के अत्याचारों से तंग आकर राजपुरोहित वशिष्ठ से उपाय पूछा। वशिष्ठ ने बताया कि ढोंढा माली नामक दैत्य की पुत्री है। अनेक प्रकार के जप-तप से उसने बहुत से देवताओं को प्रसन्न कर वरदान प्राप्त कर लिया है, जिसके प्रभाव से देवता, मानव द्वारा उसे अस्त्र-शस्त्र आदि से मारा नहीं जा सकता। इस वर के बाद उसका अत्याचार बढ़ गया है, लेकिन शिव के एक शाप के कारण वह बच्चों जैसी शरारतों से मुक्त नहीं है। यदि फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन जब न अधिक सर्दी रहेगी और न अधिक गर्मी, तब सब बच्चे अपने घर से लकड़ी लेकर निकले और उसे एक स्थान पर रखें और रक्षोहन मंत्र पढ़कर आग लगाएं, ऊंचे स्वर में चिल्लाएं और धूल व कीचड़ फेंके, बच्चों ने वैसा ही किया और ढोंढा भाग गई। इसी स्मृति में होली का पर्व मनाया जाता है।
तीसरी कथा के अनुसार कंस अपने पिता से राज्य छीनकर स्वयं शासक बन गया और अत्याचार करने लगा। एक भविष्यवाणी के द्वारा उसे पता चला कि वासुदेव व बहन देवकी का आठवां पुत्र उसके विनाश का कारण बनेगा। यह जानकार उसने वासुदेव व देवकी को कारागार में डाल दिया। कारागार में जन्म लेने वाली देवकी की सात संतानों को उसने मार डाला। आकाशवाणी हुई कि कंस को मारने वाला गोकुल में है। इसके लिए उसने पूतना को गोकुल भेजा ताकि कृष्ण को मारा जा सके। कृष्ण ने उसी का वध कर दिया। इन कथाओं के अलावा होली त्योहार को राधा-कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जोड़ा जाता है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव गणों का वेश धारण करते हैं और शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर
keyword: holi
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा
विष्णु पुराण की एक कथा के अनुसार प्रहलाद के पिता दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने तपस्या कर देवताओं से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि वह न तो पृथ्वी पर मरेगा न आकाश में, न दिन में मरेगा न रात में, न घर में मरेगा न बाहर, न अस्त्र से मरेगा न शस्त्र से, न मानव से मरेगा न पशु से। इस वर को प्राप्त करने के बाद वह स्वयं को अमर समझकर नास्तिक व निरंकुश हो गया। वह चाहता था कि उसका पुत्र प्रहलाद भगवान की आराधना छोड़ दे, परन्तु प्रहलाद इस बात के लिए राजी न थे। हिरण्यकश्यप ने उन्हें बहुत प्राणान्तक यातनाएं दी लेकिन वह परमात्मा की कृपा से हर बार बच निकले। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग से नहीं जलेगी, इसलिए उसने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रहलाद को लेकर आग में बैठ जाए। होलिका ने उन्हें अपने गोद लेकर जब आग में प्रवेश किया तो होलिका भष्म हो गई और प्रहलाद नारायण-नारायण कहते बाहर निकल आए। होलिका का अंत होने की खुशी में हम होली का पर्व मनाते हैं।
भविष्य पुराण की एक कथा के अनुसार सतयुग में रघु नामक एक प्रसिद्ध एवं कल्याणकारी राजा थे। उनके राज्य में सभी सुखी थे। एक दिन बहुत से लोग त्राहि-त्राहि करते हुए उनके द्वार पर आए और बोले महाराज ढोंढा नामक राक्षसी हमारे अबोध बच्चों को खा जाती है। राजा रघु ने ढोंढा के अत्याचारों से तंग आकर राजपुरोहित वशिष्ठ से उपाय पूछा। वशिष्ठ ने बताया कि ढोंढा माली नामक दैत्य की पुत्री है। अनेक प्रकार के जप-तप से उसने बहुत से देवताओं को प्रसन्न कर वरदान प्राप्त कर लिया है, जिसके प्रभाव से देवता, मानव द्वारा उसे अस्त्र-शस्त्र आदि से मारा नहीं जा सकता। इस वर के बाद उसका अत्याचार बढ़ गया है, लेकिन शिव के एक शाप के कारण वह बच्चों जैसी शरारतों से मुक्त नहीं है। यदि फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन जब न अधिक सर्दी रहेगी और न अधिक गर्मी, तब सब बच्चे अपने घर से लकड़ी लेकर निकले और उसे एक स्थान पर रखें और रक्षोहन मंत्र पढ़कर आग लगाएं, ऊंचे स्वर में चिल्लाएं और धूल व कीचड़ फेंके, बच्चों ने वैसा ही किया और ढोंढा भाग गई। इसी स्मृति में होली का पर्व मनाया जाता है।
तीसरी कथा के अनुसार कंस अपने पिता से राज्य छीनकर स्वयं शासक बन गया और अत्याचार करने लगा। एक भविष्यवाणी के द्वारा उसे पता चला कि वासुदेव व बहन देवकी का आठवां पुत्र उसके विनाश का कारण बनेगा। यह जानकार उसने वासुदेव व देवकी को कारागार में डाल दिया। कारागार में जन्म लेने वाली देवकी की सात संतानों को उसने मार डाला। आकाशवाणी हुई कि कंस को मारने वाला गोकुल में है। इसके लिए उसने पूतना को गोकुल भेजा ताकि कृष्ण को मारा जा सके। कृष्ण ने उसी का वध कर दिया। इन कथाओं के अलावा होली त्योहार को राधा-कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जोड़ा जाता है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव गणों का वेश धारण करते हैं और शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर
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टिप्पणियाँ

अच्छी जानकारी ..... शुभ होली , मंगलकामनाएं
जवाब देंहटाएंAwesome post!Happy holi:)
जवाब देंहटाएंThanks For recalling...gr8
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