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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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हिन्दू धर्म पर एक सबसे बड़ा आक्षेप लगाया जाता रहा है कि इसमें अनेक देवी-देवता हैं। संसार का सबसे पुराना धर्म होते हुए इसमें एक बात पर सहमति नहीं है कि किसे मानें और किसे न मानें। तथ्यों को न जानने वाले प्राय: कहा करते हैं कि वैदिक काल से लेकर पुराणों तक, अवतारी लीला पुरुषों तक अनगिनत आराध्य इष्ट हिन्दुओं में हैं। इनका कोई एक ईश्वर नहीं है। ऐसा वे केवल देव संस्कृति का बहिरंग पक्ष देखकर अपना मत बना लेते हैं। परन्तु क्रांतिदर्शी चिन्तक स्तर के ऋषिगण इतने अदूरदर्शी न थे। इस संबंध में ऋग्वेद का एकमात्र चिंतन स्पष्ट करता है, ऋषि कहते हैं- ‘इन्द्रं मित्रं वरुणमाग्निमाहुतो दिव्य: स सुपर्णो गरूत्मान। सद्विप्रा बहुधा वदन्ति अग्निं यमं मातरिश्वानमाहु।।’ अर्थात एक सत्स्वरूप परमात्मा को बुद्धिमान ज्ञानी लोग अनेक प्रकारों व अनेक नामों से पुकारते हैं। उसी को वे अग्नि, यम, मातरिश्वा, इन्द्र, मित्र, वरुण, दिव्य, सुपर्ण, गरूत्मान इत्यादि नामों से स्मरण करते हैं। सारा वैदिक वांग्मय इसी प्रकार की घोषणा से भरा है। जिसमें एक सद्घन, चितघन, आनन्दघन तत्व को मूलत: स्वीकार करके उसके अनेक रूपों को मान्यता दी गई है। एक प्रकार से एकत्व में अनेकत्व व अनेकत्व में एकत्व, यह एक निराले प्रकार का दर्शन हिन्दू संस्कृति का है, जो कहीं अन्यत्र देखने को नहीं मिलता है। शंकराचार्य ने अद्वैत का सिद्धान्त देकर यही बात कहने की कोशिश की है कि दो नहीं है। मैक्समूलर के अनुसार- वैदिक काल के ऋषि बड़े विद्वान थे। विभिन्न देवताओं के रूप में ऋषियों ने परमेश्वर की विभिन्न शक्तिधाराओं की गुण रूप में चर्चा कर उसकी महिमा का वर्णन किया है। मैक्समूलर ने वेदों में हेनोथीइज्म या उपास्य श्रेष्ठतावाद का प्रतिपादन किया जिसे बाद के अध्येयताओं ने अलग-अलग ढंग से समझकर उसकी व्याख्या की। ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ स्वर जितनी बार गूंजता है, हर बार एक महान प्रेरणा व संजीवनी हमें प्राप्त होती है। उस एक ईश्वरीय सत्ता के बारे में जिसे विभिन्न संप्रदाय, विभिन्न मत और अलग-अलग नामों से जानते हैं, वैदिक आधार पर वह एक ही है। आचार्य यास्क ने देव शब्द की निरुक्ति ‘दा’ ‘द्युत’ ‘दिवु’ इन धातुओं से की है। इसके अनुसार ज्ञान, प्रकाश, शांति, आनंद तथा सुख देने वाली सब वस्तुओं को देव कहा गया है। यजुर्वेद में अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्रमा, वसु, रूद्र, आदित्य, इन्द्र इत्यादि को देव नाम से इसलिए पुकारा गया कि यह शब्द सत्यविद्या का प्रकाशन करने वाले ब्रह्मनिष्ठ, सत्यनिष्ठ विद्वानों के लिए प्रयुक्त होता है। ज्ञान दान करने वाले वे देवता मनुष्यों को प्रकाशवान बनाते हैं, इसलिए उन्हें देव कहा जाता है। ऋग्वेद के षष्ठ मंडल में कहा गया है कि- ‘य एकएत् तमुष्टुहि कृष्टीना विचर्षणि पतिर्यज्ञो वृषक्रतु:।।’ अर्थात जो परमेश्वर एक है तू उसी की स्तुति कर। वह परमात्मा सब मनुष्यों की देखभाल करने वाला है। सामवेद के एक मंत्र में कहा गया है- हे मनुष्यों तुम सब सरल भाव और आत्मिक बल से एक परमेश्वर का भजन करो जो समस्त जगत में अतिथि की तरह पूजनीय है। ज्ञान, कर्म, भक्ति आदि के सभी मार्ग उसी की ओर जाते हैं, वह नित्य रूप से एक ही है।
डब्ल्यू डी ब्राउन ने ‘सुपिरीयॉरिटी आॅफ वैदिक रिलीजन’ में लिखा है- वैदिक धर्म एक ही परमात्मा को मान्यता देता है। चार्ल्स कोलमैन ‘माइथोलॉजी आॅफ हिन्दूज’ में लिखते हैं कि आराध्य सत्ता की परिभाषा वेदों में विभिन्न रूपों में की गई है, जो सबकुछ देखता है पर स्वयं नहीं दिखाई देता, वह ब्रह्म है। श्लेगेल सभी विवादों का एक मत से उत्तर देते हुए लिखते हैं- यह एक स्तर से कहा जा सकता है कि वैदिक काल के निवासी उच्च कोटि के विद्वान थे और उनकी मोनोथीज्म की मान्यता सर्वोपरि है अर्थात वे एकेश्वरवादी हैं। वेद मात्र एक आराध्य की शिक्षा देता है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर
keyword: hindu
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा
डब्ल्यू डी ब्राउन ने ‘सुपिरीयॉरिटी आॅफ वैदिक रिलीजन’ में लिखा है- वैदिक धर्म एक ही परमात्मा को मान्यता देता है। चार्ल्स कोलमैन ‘माइथोलॉजी आॅफ हिन्दूज’ में लिखते हैं कि आराध्य सत्ता की परिभाषा वेदों में विभिन्न रूपों में की गई है, जो सबकुछ देखता है पर स्वयं नहीं दिखाई देता, वह ब्रह्म है। श्लेगेल सभी विवादों का एक मत से उत्तर देते हुए लिखते हैं- यह एक स्तर से कहा जा सकता है कि वैदिक काल के निवासी उच्च कोटि के विद्वान थे और उनकी मोनोथीज्म की मान्यता सर्वोपरि है अर्थात वे एकेश्वरवादी हैं। वेद मात्र एक आराध्य की शिक्षा देता है।
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टिप्पणियाँ
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ati uttam!!
जवाब देंहटाएंthanks asteria
जवाब देंहटाएंBahut hi upyogi jankari di aapne.
जवाब देंहटाएंShayad ye bhi aapko pasand aayen- Albert Einstein Quotes , Love Quotes for Him
sir aishi hi jankari dety rhiy
जवाब देंहटाएंYou may like - Guest Blogging Mistakes You Must Avoid