जब मनौती भूल जाएं तो क्या करें

आजकल प्राय: हर वर्ग के लोग अपेक्षितमनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किसी देवता,तीर्थ अथवा देवस्थान से मनौत्ी करता है कि हमारीअमुक कामना की पूर्ति के उपरांत हम आपको पूजा, भेंट, दर्शनादि करेंगे। यद्यपि आध्यात्मिक दृष्टि से यह पद्धतिउत्तम नहीं कही जा सकती, किंतु समाज में हर प्रकार के व्यक्ति होते हैं और परंपरा से इस तरह लोग अपने विश्वास के बल पर उन-उन श्रद्धास्पद स्थानों से अपनी कामना सिद्ध कर लेते हैं। अत: मनौती करना अनुचित नहीं कहा जा सकता। प्राचीन काल से ही सर्वसामान्य जन, धन, संतान, स्त्री, पति, स्वास्थ्य आदि अभीष्ट अभिलाषाओं को जब स्वयं नहीं पूरी कर पाता, तब अपने ईष्ट या आराध्य का सहारा लेता है। यहीं से ईश्वरके प्रति विश्वास आरंभ होता है। यही लोग समाज में धार्मिक व्यक्ति के रूप में माने जाते हैं। किंतु किसी भी मत, संप्रदाय आदि के अनुयायी को यह आवश्यक है कि निश्चित समय सीमा के अंतर्गत देवताओं के प्रति किए हुए अपने वचन को पूरा करें। अन्यथा केवल निजी स्वार्थ के लिए जब हम अपने ईष्ट से याचना करते हैं तब दोनों का स्तर निम्न हो जाता है।
मनौती करते समय बहुत सावधान रहना चाहिए, क्योंकि यदि समय पर हमने देवता का आदर नहीं किया तो हमें उस देवता का कोपभाजन भी बनना पड़ता है, जिससे हमें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। संपूर्ण विश्व में इस प्रकार प्रार्थना (मनौती) के बल पर लोगों की भयंकर विपत्ति से छुटकारा मिलने की अनेक कहानियां प्रचलित हैं। जिससे यह सिद्ध होता है कि हमारी आस्था, विश्वास और सकंल्प में जितना ही बल होगा, हमें उतना ही शीघ्र और अधिक सफलता प्राप्त होगी। प्रार्थना या मनौती करते समय यह विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हमें ईष्ट पर पूर्ण विश्वास रहे, कभी भी संदेह और अविश्वास की भावना नहीं आने दें। इस संदर्भ में यह भी ध्यान देना बहुत आवश्यक है कि हम जो भी मनौती करें, उसको कभी भूले नहीं, क्योंकि यदि कोई अपनी मनौती भूल जाता है, तो उसका दुष्परिणाम उसका परिवार तथा उसके वंशजों को भुगतना पड़ता है।
कदाचित इस तरह की कोई भूल स्वयं अथवा अपने पूर्वजों से हो जाए तो इसका प्रायश्चित करने से ही सांत्वना प्राप्त होगी। प्रायश्चित श्रेष्ठ विद्वानों, ज्ञानियों और गुरुजनोंसे प्राप्त कर लेना चाहिए। यदि मन्नत पूरी करने में पर्याप्त विलंब हो गया हो, परंतु मन्नत याद हो तो उस मनौती का दस गुना करने से प्रायश्चित हो जाता है। यदि मनौती याद न हो, इस परिस्थिति में ईष्ट देवता या कुल देवता का यज्ञ-अनुष्ठान विधि-विधान से करना चाहिए।
एस्टोलाजी टुडे से साभार

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