शुभ कर्मों को अक्षय करती है अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया का हिन्दू संस्कृति में बड़ा महत्व है। यह पर्व वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। 13 मई दिन सोमवार को सूर्योदय 5 बजकर 24 मिनट पर और तृतीया तिथि का मान 11 दंड 49 पला अर्थात दिन में 10 बजकर 8 मिनट तक है। सोमवार को मृगशिरा नक्षत्र और सुकर्मा योग तथा गर करण होने से आनंद नामक महायोग बन रहा है। इसलिए इस दिन किए जाने वाले शुभ कार्य का फल अक्षय रहेगा।

क्या है महत्व
आचार्य शरदचंद्र मिश्र के अनुसार इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों ग्रह अपने परमोच्च पर रहते हैं। सूर्य मेष राशि और चंद्रमा वृष राशि पर रहता है। ये दोनों राशियां सूर्य और चंद्रमा की परमोच्च राशियां हैं। कोई भी शुभ योग क्यों न हो, वे पूर्ण रूप से तब तक फलीभूत नहीं होते जब तक सूर्य और चंद्रमा में बल न हो। इस दिन किए जाने वाले जप, तप, दान सूर्य व चंद्रमा को बली करते हैं। ऐसा करने वाले व्यक्ति को सूर्य व चंद्रमा का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसी दिन भगवान सूर्य ने पांडवों को अक्षय पात्र प्रदान किया था। इसका अर्थ है कि इस दिन भगवान सूर्य का आशीर्वाद प्राप्त हो जाय तो घर में धन-धान्य और सुख-समृद्धि की कमी नहीं रहती है। इसी दिन भगवान कृष्ण और सुदामा का पुन: मिलाप हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण चंद्रवंशीय हैं। चंद्रमा इस दिन उच्च का होता है, यह मन का कारक ग्रह भी है और सुदामा नि:स्वार्थ भक्ति के प्रतीक हैं। इसका तात्पर्य है कि यदि नि:स्वार्थ भक्ति के साथ मन को प्रभु को समर्पित किया जाय तो प्रभु वैसे ही प्रसन्न हो जाते हैं जैसे सुदामा की भक्ति से प्रसन्न हुए थे।
अक्षय तृतीया को युगादि भी कहा जाता है। युगादि का शाब्दिक अर्थ है एक युग का आरंभ। इस दिन त्रेता युग का आरंभ हुआ था। त्रेता युग में भगवान राम का जन्म हुआ था जो सूर्यवंशी थे। इसी दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। भगवान परशुराम के बारे में कहा जाता है कि इन्होंने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय रहित किया था। क्षत्रिय से तात्पर्य किसी जाति विशेष से नहीं है वरन सत्व, रजस व तमस गुण की मानसिक स्थिति से है। नर-नारायण और ह्यग्रीव का अवतार भी इसी दिन हुआ था। इस दिन चतुर्थी योग है, इसलिए यह तिथि शुभद और महान फल प्रदान करने वाली है। इस दिन सफलता की आशा से व्रत रहने के अतिरिक्त वस्त्र, शस्त्र और आभूषण बनवाए जाते हैं और धारण किए जाते हैं। नवीन कार्यों का शुभारंभ किया जाता है। ज्योतिषी लोग आगामी वर्ष की तेजी-मंदी जानने के लिए इस दिन सब प्रकार के अन्न, वस्त्र आदि व्यावहारिक वस्तुओं और व्यक्ति विशेष के नामों को तौलकर सुपूजित स्थान में रखते हैं और दूसरे दिन फिर उसे तौलकर न्यूनता से भविष्य का शुभाशुभ फल ज्ञात करते हैं। यह आत्म निरीक्षण की तिथि भी कहलाती है। इसी दिन बद्रीनाथजी के मंदिर का कपाट खोला जाता है। वृंदावन के श्रीबिहारीजी के चरणों का दर्शन वर्ष में एक बार इसी दिन होता है। यह अबूझ मुहूर्त के रूप में विख्यात तिथि है।

अक्षय तृतीया व्रत
इस दिन भगवान विष्णु का षोडशोपचार पूजन करें। उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं, सुगन्धित पुष्पमाला पहनाएं और नैवेद्य में नर-नारायण के निमित्त कोमल ककड़ी और ह्यग्रीव के निमित्त चने की दाल अर्पण करें। हो सके तो उपवास या समुद्र स्नान या गंगा स्नान करें और जौ, गेहूं, चना, सत्तू, दही, चावल, ईख के रस और दूध से बने पदार्थ तथा स्वर्ण व जल पूर्ण कलश, धर्मघट, अन्न, सब प्रकार के रस और ग्रीष्म ऋतु के लिए उपयोगी वस्तुओं का दान करें। पितृ श्राद्ध करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएं। इस प्रकार अक्षय तृतीया को जो भी दान किया जाता है, उसका अक्षय फल प्राप्त होता है।

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