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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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एकादशी भगवान विष्णु का महाव्रत है। वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी वरूथिनी एकादशी के नाम से जानी जाती है। कृष्ण पक्ष की एकादशी होने के कारण यह वानप्रस्थ, संन्यासी और विधवा व विधुरों के लिए प्रशस्त है, परन्तु यदि एकादशी का व्रत निष्काम कर रहे हैं तो दोनों पक्षों के व्रत किए जा सकते हैं। 5 मई 2013 को यह एकादशी है। इस व्रत को करने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है।
व्रती को एक दिन पूर्व से ही इस व्रत में संलग्न हो जाना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए तथा यथा सामर्थ्य जप, यज्ञ, भजन-कीर्तन आदि के द्वारा जागरण करना चाहिए। द्वादशी को पुन: पूजन करने के पश्चात पारण करना चाहिए।
एकादशी का व्रत तीन दिनों तक आचार-विचार को महत्व देता है। इसके लिए दशमी, एकादशी, द्वादशी तीनों दिन आचार-विचार पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इन तीन दिनों में कांसे के बर्तन, मसूर, चना, शाक, शहद, तेल, मैथुन, द्युतक्रीड़ा, मिथ्या भाषण, हिंसा, अधिक जलपान आदि से बचना चाहिए। दशमी व द्वादशी को जौ, गेहूं, मूंग, सेंधा नमक, काली मिर्च, शक्कर, गोघृत और साठी का चावल केवल एक बार खाना चाहिए। एकादशी व्रत 80 वर्ष तक की अवस्था तक करना चाहिए। यदि न चल सके तो बीच में ही उद्यापन कर देना चाहिए।
व्रत कथा- प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करते थे। मान्धाता योग्य शासक होने के साथ-साथ दयालु, धार्मिक व दानशील भी थे। एक बार की बात है कि वह वन में तपस्या कर रहे थे। तभी वहां एक जंगली भालू आ गया और उनके पैर को मुंह में पकड़कर घसीटकर जंगल में ले जाने लगा। राजा चूंकि तपस्या कर रहे थे इसलिए उन्होंने भालू पर क्रोध न करके उसे मारने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने अपनी रक्षा के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की। उस समय भगवान विष्णु अपने भक्त को कष्ट में देखकर स्वयं प्रकट हुए और सुदर्शन चक्र से भालू को मार डाला, लेकिन राजा का पैर खराब हो चुका था। राजा मान्धाता बहुत दु:खी हुए। उन्हें दु:खी देखकर भगवान विष्णु ने मान्धाता से कहा कि वह मथुरा नगर जाकर वहां वरूथिनी एकादशी व्रत रहकर वाराह मूर्ति की पूजा करें। ऐसा करने से वह सर्वांग संपन्न हो जाएंगे। भगवान की आज्ञा प्राप्त कर राजा मथुरा गए और वहां वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को व्रत किया, जिसके प्रताप से उसका पैर ठीक हो गया और वह समस्त पापों से मुक्त हो गए।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर
keyword: varuthini ekadashi
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा
व्रती को एक दिन पूर्व से ही इस व्रत में संलग्न हो जाना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए तथा यथा सामर्थ्य जप, यज्ञ, भजन-कीर्तन आदि के द्वारा जागरण करना चाहिए। द्वादशी को पुन: पूजन करने के पश्चात पारण करना चाहिए।
एकादशी का व्रत तीन दिनों तक आचार-विचार को महत्व देता है। इसके लिए दशमी, एकादशी, द्वादशी तीनों दिन आचार-विचार पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इन तीन दिनों में कांसे के बर्तन, मसूर, चना, शाक, शहद, तेल, मैथुन, द्युतक्रीड़ा, मिथ्या भाषण, हिंसा, अधिक जलपान आदि से बचना चाहिए। दशमी व द्वादशी को जौ, गेहूं, मूंग, सेंधा नमक, काली मिर्च, शक्कर, गोघृत और साठी का चावल केवल एक बार खाना चाहिए। एकादशी व्रत 80 वर्ष तक की अवस्था तक करना चाहिए। यदि न चल सके तो बीच में ही उद्यापन कर देना चाहिए।
व्रत कथा- प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करते थे। मान्धाता योग्य शासक होने के साथ-साथ दयालु, धार्मिक व दानशील भी थे। एक बार की बात है कि वह वन में तपस्या कर रहे थे। तभी वहां एक जंगली भालू आ गया और उनके पैर को मुंह में पकड़कर घसीटकर जंगल में ले जाने लगा। राजा चूंकि तपस्या कर रहे थे इसलिए उन्होंने भालू पर क्रोध न करके उसे मारने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने अपनी रक्षा के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की। उस समय भगवान विष्णु अपने भक्त को कष्ट में देखकर स्वयं प्रकट हुए और सुदर्शन चक्र से भालू को मार डाला, लेकिन राजा का पैर खराब हो चुका था। राजा मान्धाता बहुत दु:खी हुए। उन्हें दु:खी देखकर भगवान विष्णु ने मान्धाता से कहा कि वह मथुरा नगर जाकर वहां वरूथिनी एकादशी व्रत रहकर वाराह मूर्ति की पूजा करें। ऐसा करने से वह सर्वांग संपन्न हो जाएंगे। भगवान की आज्ञा प्राप्त कर राजा मथुरा गए और वहां वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को व्रत किया, जिसके प्रताप से उसका पैर ठीक हो गया और वह समस्त पापों से मुक्त हो गए।
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