यंत्र साधना से पूर्ण होती हैं मनोकामनाएं

कोई भी साधना तंत्र, मंत्र एवं यंत्र, इन तीनों में से ही किसी एक रूप में होती है। तंत्र के अंतर्गत उपाय, टोटके, हवन आदि आते हैं। मंत्र साधना के अंतर्गत ‘ऊं नम: शिवाय’, ‘राम’, ‘ऊं नमो भगवते वासुदेवाय’ इत्यादि मंत्रों का जप किया जाता है। यंत्र, कवच साधना के अंतर्गत कागज अथवा भोजपत्र या धातु पत्र पर विशिष्ट स्याही से या किसी अन्यान्य साधनों के द्वारा आकृति, चित्र या संख्याएं बनाई जाती हैं। इस आकृति की पूजा की जाती है अथवा एक निश्चित संख्या तक उसे बार-बार बनाया जाता है। साधना के ये तीनों प्रकार पृथक-पृथक रूप से सफलता प्रदान करने वाले होते हैं। कई बार इन तीनों का एक साथ भी प्रयोग किया जाता है। तंत्र एवं मंत्र साधना की अपेक्षा कई बार यंत्र व कवच साधना करना अधिक उपयोगी होता है। तंत्र साधना में जहां जरा सी टोका-टोकी या तंत्र के प्रकट हो जाने से असफलता की संभावना बढ़ जाती है, वहीं मंत्र साधना में भी गलत उच्चारण एवं अशुद्धि की आशंका रहती है। यंत्र साधना में अधिकांशत: अंकों से संबंधित यंत्र अधिक प्रचलित हैं। अत: इसमें त्रुटि की आशंका नगण्य रहती है। श्रीयंत्र, घंटाकर्ण यंत्र आदि अनेक यंत्र ऐसे भी हैं जिनकी रचना में मंत्रों का भी प्रयोग होता है और ये बनाने में अति क्लिष्ट होते हैं। इन्हें बनाने के लिए विशिष्ट विधि, मुहूर्त और अतिरिक्त दक्षता की आवश्यकता है। जो भी हो मनोकामना पूर्ति के लिए जितने प्रभावी ये क्लिष्ट यंत्र व कवच होते हैं, उतने ही आसानी से बनाए जा सकने वाले संख्यात्मक यंत्र और कवच भी होते हैं। यंत्र साधना के कतिपय नियम होते हैं जिनका पालन करना आवश्यक होता है। पहले यंत्रों की साधना में ध्यातव्य कुछ नियम के विषय में निर्देश किया जा रहा है।

विहितवार- वशीकरण से संबंधित यंत्र साधना सोमवार से, सम्मोहन से संबंधित यंत्र साधना बुधवार से, आकर्षण से संबंधित यंत्र साधना बृहस्पतिवार से, धन-धान्य वृद्धि से संबंधित यंत्र साधना शुक्रवार से, उच्चाटन से संबंधित यंत्र साधना मंगलवार से और मारण अथवा शत्रुनाश से संबंधित यंत्र साधना रविवार से या शनिवार के दिन करना शुभ रहता है। यदि ग्रह शांति हेतु यंत्र या कवच साधना कर रहे हैं तो जिस ग्रह के यंत्र या कवच का निर्माण कर रहे हैं, उस ग्रह का ही वार होना चाहिए। जैसे शनि दोष हेतु शनिवार, मंगल दोष हेतु मंगलवार शुभ रहता है।

यंत्र या कवच का आधार- यंत्र या कवच बनाने हेतु जहां कोई निर्देश दिया गया हो, उसी का पालन करते हुए यंत्र या कवच बनाना चाहिए। जहां इस प्रकार का कोई निर्देश न दिया गया हो, वहां भोजपत्र या भोजपत्र अनुपलब्ध होने पर कागज पर भी यंत्र बनाया जा सकता है।

स्याही- यंत्र बनाने के लिए जिस प्रकार की स्याही निर्दिष्ट हो, उसी प्रकार की स्याही प्रयोग करना चाहिए। जहां इस प्रकार का कोई निर्देश न दिया गया हो, वहां क्रमश: अष्टगंध, पंचगंध, केसर, चंदन, सिन्दूर एवं कुंकुम का प्रयोग प्राथमिकता एवं उपलब्धता के आधार पर किया जा सकता है।

उपयोग- यंत्र या कवच बनाने के पश्चात कई बार यह भी समस्या उत्पन्न हो जाती है कि अब इन यंत्रों और कवचों का क्या करें। ऐसी स्थिति में जैसा निर्देश प्राप्त हो वैसा कर लेना चाहिए, लेकिन यदि कोई निर्देश नहीं दिया गया हो तो समस्त यंत्रों या कवचों को किसी बहते पानी में बहा दें या तीर्थस्थल पर छोड़ दें। लेकिन इनमें से जो यंत्र या कवच सबसे अंत में बनाया गया हो, उसे अपने पास रखा जाय और उसकी नित्य पूजा-अर्चना करें।

विहित समय- यंत्र या कवच निर्माण हेतु प्रात:काल या मध्य रात्रि का समय सर्वोत्तम होता है। शेष समय में भी यंत्र या कवच बनाए जा सकते हैं।

स्थान- मारण या शत्रुनाश वाले यंत्र या कवचों को छोड़कर शेष सभी यंत्रों व कवचों के निर्माण के लिए पूजा गृह या मंदिर सर्वोत्तम स्थान है। मारण या शत्रुनाश वाले यंत्रों व कवचों के लिए निर्जन स्थान या श्मशान आदि अधिक उपयुक्त रहते हैं।

कलम- यंत्र या कवच निर्माण में लेखनी के रूप में विभिन्न वनस्पतियों या वृक्षों की जड़ या टहनी से बनाई गई कलम कामना भेद से प्रयुक्त होती है। लेकिन जहां किसी विशेष प्रकार की कलम का उल्लेख न हो, वहा रविपुष्य, गुरुपुष्य, नवरात्र, होली, दीपावली, शिवरात्रि, दशहरा या अन्य विशिष्ट दिवसों में तोड़ी गई अनार या चमेली की कलम प्रयोग में लाई जानी चाहिए।जिस प्रकार तंत्र साधना में किसी प्रकार की टोका-टोकी एवं मंत्र साधना में माला का हाथ से छूटना या मन उचटना असफलता का संकेत होता है, उसी प्रकार यंत्र या कवच साधना में लेखनी का टूट जाना या यंत्र पर पानी फैल जाना इत्यादि असफलता का सूचक है। इसलिए यंत्र या कवच निर्माण में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए।

दिशा- वशीकरण, सम्मोहन या आकर्षण के यंत्र या कवच उत्तर दिशा की ओर मुंह करके, धन प्राप्ति से संबंधित यंत्र या कवच पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके, सुख-शांति से संबंधित यंत्र या कवच पूर्व दिशा की ओर मुंह करके, शत्रु बाधा निवारण या क्रूर कर्म से संबंधित यंत्र या कवच दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके लिखना चाहिए।

अन्य बातें- यंत्र या कवच लेखन से पूर्व भगवान गणपति, भगवान शिव और अपने इष्टदेव का स्मरण कर लेना चाहिए। लेखन के दौरान धूप-दीप आदि भी प्रज्वलित करना चाहिए। लिखते समय श्वेत वर्ण या साफ-सुथरा वस्त्र धारण कर बैठना चाहिए। यंत्र या कवच लिखते समय चौकी या पाटा बिछाकर उसे आधार बनाकर लिखना चाहिए। घुटने या गोद में रखकर यंत्र या कवच का आकार बनाना निषिद्ध माना गया है। इसमें सर्वोपरि विश्वास और गुरुकृपा होती है। अत: यंत्र या कवच के प्रति पूर्ण विश्वास व गुरु में पूर्ण आस्था होनी चाहिए। वैसे यह साधना कभी भी की जा सकती है लेकिन नवरात्र, होली, दीपावली इत्यादि विशिष्ट दिवसों में की गई साधना के अनंतर यह पूर्ण फलदायी होती है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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