नौ दिन तक चलती है जगन्नाथ रथयात्रा

विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा अषाढ़ शुक्ल द्वितीया से प्रारंभ होती है। रथयात्रा पुरी स्थित मंदिर से निकलकर गुण्डिया तक जाती है। यह नौ दिन की यात्रा है जो अषाढ़ शुक्ल द्वितीया से दशमी तक होती है। इस रथयात्रा के लिए लकड़ी के तीन रथ बनाए जाते हैं। बलराम जी के लिए लाल व हरे रंग का ‘तालध्वज’ नामक रथ, सुभद्रा जी के लिए लाल व नीले रंग का ‘दर्पदलना’ नामक रथ और भगवान श्रीजगन्नाथ के लिए लाल व पीले रंग का ‘नन्दीघोष’ नामक रथ बनाया जाता है। पूर्व समय में छह रथ बनाए जाते थे। इसका कारण यह था कि पुरी के समीप से बांकी मुहाना नदी बहती थी। यह नदी रथयात्रा के मध्य में पड़ती थी, अत: तीन रथ नदी के इस ओर और तीन रथ नदी के उस ओर प्रयुक्त होते थे। बाद में राजा नरसिंह देव ने उक्त नदी को पटवा दिया, तब से तीन ही रथों का प्रचलन है। प्रत्येक वर्ष तीनों रथों का निर्माण किया जाता है। निर्माण कार्य का प्रारंभ बसंतपंचमी को लकड़ियां एकत्र करने से हो जाता है। अक्षय तृतीया से रथों का निर्माण कार्य शुरू होता है और रथयात्रा के कुछ दिन पूर्व तक चलता रहता है। निर्माण कार्य में नई लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। रथों के निर्माण में कहीं भी लोहे का प्रयोग नहीं होता है। आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा को तीनों रथों को मंदिर के मुख्य द्वार के सामने लगे गरुण स्थल के समीप खड़ा किया जाता है। इसमें सबसे आगे तालध्वज नामक रथ, उसके बाद सुभद्रा जी का दर्पदलना नामक रथ और सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ नन्दीघोष नामक रथ होता है। रथयात्रा के दिन प्रात:काल से ही रथयात्रा संबंधी रीति-रिवाजों को बड़ी श्रद्धा व विश्वास के साथ पूरा किया जाता है। इन रीति-रिवाजों में दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं- ‘पोहंडी बिजे’ व ‘छेरा पोहरा’। भगवान जगन्नाथ के विग्रह को मंदिर से रथ पर लाने की क्रिया- ‘पोहंडी बिजे’ कहलाती है। इस क्रिया में घंटा-घड़ियाल आदि वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं तथा विशिष्ट लय में भजन गाए जाते हैं। विग्रह को इस प्रकार ले जाया जाता है कि भगवान मस्त होकर झूम-झूमकर चल चल रहे हों। सर्वप्रथम सुदर्शन चक्र को सु•ाद्रा के रथ पर पहुंचाया जाता है। दूसरा प्रमुख रिवाज ‘छेरा पोहरा’ है। इसके अंतर्गत पुरी के भूतपूर्व राजा रथों को सोने की झाड़ू से बुहारते हैं। छेरा पोहरा के बाद रथयात्रा प्रारंभ होती है। इस रथयात्रा में रथों में घोड़े नहीं जुते जाते है वरन इसे श्रद्धालु खींचते हैं। इस प्रक्रिया को रथटण कहा जाता है। लगभग चार हजार श्रद्धालु एक साथ इस रथ को खींचते हैं। तीन मील के बड़दण्ड से गुजरते हुए तीनों रथ सायंकाल गुण्डिया मंदिर पहुंचते हैं। यहां भगवान नौ दिन तक विश्राम करते हैं। आठवें दिन गुण्डिया मंदिर के सगीबाली मैदान पर तीनों रथों को घुमाकर सीधा किया जाता है। दशमी के दिन यात्रा वापस लौटती है। इस वापसी यात्रा को ‘बहुड़ा जात्रा’ कहते हैं। वापस आने पर भगवान एकादशी के दिन मंदिर के बाहर ही दर्शन देते हैं। उनका स्वर्णाभूषणों से श्रृंगार किया जाता है, इसे सुनाभेस कहते हैं। द्वादशी के दिन रथों पर ‘अधरपणा’ के पश्चात भगवान को मंदिर में प्रवेश कराया जाता है। इसे ‘नीलाद्रि बिजे’ कहा जाता है। मंदिर के बाहर नौ दिनों के दर्शन को ‘आड़प दर्शन’ कहते हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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