रमजानुल के आने की खुशी व जाने का गम दिलाता है जन्नत पर हक

तेरे आने से जमाना हर तरफ पुर नूर था।
मस्जिदों, मेहराबों मिंबर जगमगाते जा बजा।
रोजादारों का भी था चेहरा बड़ा रौनक भरा।
आह! ऐसी बरकतें अब हम से होती है जुदा।
है जबानों जानों दिल गोया हरासॉं अलवदाअ।
हसरता व हसरता ऐ माहे रमजॉं अलवदाअ।
अब मोहतरम मेहमान माहे रमजान की जुदाई का पुर सोज बयान किया जाता है। हजरत जाबिर से मरवी है कि नबी ने फरमाया जब माहे रमजान की आखिरी रात आती है तो जमीन व आसमान और मलाइका मेरी उम्मत की मुसीबत को याद करके रोते हैं। अर्ज किया गया या रसूलल्लाह कौन सी मुसीबत ? फरमाया रमजानुल मुबारक का रूखसत होना। क्योंकि इस में सदकात और दुआओं को कबूल किया जाता है। नेकियों का अज्र व सवाब बढ़ा दिया जाता है। अजाबे दोजख दूर किया जाता है तो रमजानुल मुबारक की जुदाई से बढ़कर मेरी उम्मत के लिए और कौन सी मुसीबत हो सकती है। माहे रमजान के फुरकते जुदाई के वक्त जमीन व आसमान और मलाइका रोते हैं। माहे मुबारक रूखसत हो रहा है जिस की हर घड़ी रहमत भरी है। और जिसमें हर आन छमाछम रहमतें बरसती हैं। जिसमें जन्नत के दरवाजे खुल जाते हैं। और दोजख के दरवाजों पर ताले पड़ जाते हैं। रोजाना लाखों- करोड़ों गुनाहगारों की मग्फिरत हो जाती है। ऐसा इनआमात व करामात वाला मीठा मीठा और मुबारक मुकद्दस मेहमान रूखसत हो रहा है। माहे रमजान के आखिरी लम्हात में क्या हमें इस बात का सदमा होता है कि आह! अनकरीब अब मस्जिदों की रौनकें कम हो जायेंगी। आह! नेकियों का जोश ठंडा पड़ जाएगा। आह! रोजों का लुत्फों मजा, वक्ते इफ्तार का नूरानी समों, तरावीह का कैफो सुरूर, हर तरफ कुरआन की तिलावत और जगह- जगह नात ख्वानी की महफिलें और सेहरी के वक्त दुरूद व सलाम की मीठी मीठी आवाजें, आधी रात के बाद सेहरी के लिए जगाने वालों की सदाएं ये तमाम मनाजिर अब कहॉं नजर आयेंगे। हदीस पाक में है कि जो शख्स रमजानुल मुबारक के आने की खुशी और जाने का गम करे उसके लिए जन्नत है और अल्लाह पर हक है कि उसे जन्नत में दाखिल फरमाए।
मोहम्मद आज़म, सहायक अध्यापक मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया, इमामबाड़ा दीवान बाजार, गोरखपुर

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