मानसिक संतुलन का आधार प्राणायाम

किसी भी प्राकृतिक घटना से विद्युत चुम्बकीय तरंगें निकलती हैं। जिसका प्रभाव मनुष्य के तंत्रिका तंत्र पर पड़ता है। जिसके कारण व्यक्ति के स्वास्थ्य पर विभिन्न प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। जैसे- सिर दर्द, ललाट में भारीपन, चक्कर आना, शरीर में कम्पन महसूस करना, सुस्त रहना, किसी काम में मन नहीं लगना, क्रोध, चिड़चिड़ापन इत्यादि।
इन सभी समस्याओं का समाधान प्राणायाम का प्रात: नियमित अभ्यास करके पाया जा सकता है। प्रात: अनुलोम-विलोम, भ्रामरी, प्राणायाम का कम से कम पांच-पांच मिनट तक का अभ्यास करें।
प्राणायाम श्वसन क्रिया के माध्यम से मानव संरचना के स्थूल व सूक्ष्म स्तरों में निहित सभी प्रकार के प्राणों को संचालित व नियंत्रित करता है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव मन व शरीर पर पड़ता है। इसका अभ्यास नाडिय़ों को शुद्ध, नियंत्रित और सक्रिय बनाकर उनमें होने वाले रक्त संचार को प्रभावित कर शारीरिक एवं मानसिक स्थिरता प्रदान करता है। सर्व प्रथम ऊं का कम से कम 10 बार उच्चारण जरूर करें। इस आसन को करने के लिए किसी भी तरह से सुविधा के अनुसार बैठ सकते हैं।
विधि: ऊं में तीन अक्षरों का उच्चारण सम्मलित रूप से करें। एक लम्बी श्वास अन्दर भरें और मुंह को पूरा खोलकर अ फिर थोड़ा बन्द करके ऊं, इसके बाद पूरा मुंह बन्द करके म अक्षर का उच्चारण करें। अ, ऊ की अपेक्षा म अक्षर का उच्चारण करते-करते श्वास धीरे-धीरे बाहर निकलती जायेगी, पुन: श्वास अन्दर भरें और उच्चारण प्रारम्भ करें। इसे क्रम से दस बार अवश्य करें।
अनुलोम-विलोम : सहज व सीधे बैठकर दाहिने हाथ के अंगूठे से दाहिनी तरफ की नाक को पूरी तरह से बन्द करके बायीं नाक से धीमी गति से लम्बी श्वास लेंगे और दाहिने तरफ से जिस गति से लिया है उसी गति से छोड़ेंगे। फिर जिधर से छोड़ा है उसी तरफ से लेंगे और उसके विपरित दिशा की नाक से छोड़ेंगे। अनुलोम-विलोम का अभ्यास कम से कम पांच मिनट अवश्य काना चाहिए।
भ्रामरी : सहज व शालीनता पूर्वक बैठकर खेचरी मुद्रा लगाकर, जीभ को ऊपर की ओर मोड़कर, कान को पूरी तरह से बन्द करके, होठों को कोमलता पूर्वक बन्द करके लम्बी श्वास अन्दर भरकर ऊं का उच्चारण करें। उच्चारण करते-करते श्वांस बाहर निकलती जाती है। पुन: श्वास अन्दर लेकर ऊं का उच्चारण प्रारम्भ करें। यह ऐसा प्रतीत होगा जैसा कि भ्रमर गुंजन। यह ध्वनि इतनी मृदुल और मधुर हो कि कपाल के अग्र भाग में उसकी प्रतिध्वनि गूंजने लगे। भ्रामरी का अभ्यास कम से कम पांच मिनट अवश्य करना चाहिए।
प्रस्तुति- संतोष गुप्ता

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