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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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आत्मोन्नति के साधन के रूप में योग की महत्ता को प्राय: सभी दर्शनों ने स्वीकार किया है। यहां तक कि वेद, उपनिषद, स्मृति व पुराण में भी योगाभ्यास की चर्चा है। जब तक मनुष्य का अंत:करण या चित्त स्थिर नहीं रहता है तब तक उसे धर्म व दर्शन का सम्यक ज्ञान नहीं हो पाता है। शुद्ध हृदय व शांत मन से ही हम सत्य को जान पाते हैं। आत्मशुद्धि के लिए योग ही सर्वोत्तम मार्ग है।
-आचार्य शरदचंद्र
Keywords: yoga
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गूगल खोज से ली गई हैं, यदि किसी फोटो पर किसी को कॉपीराइट विषय पर आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगी।
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