शिवाश्रय ही दु:ख निवृत्ति का उपाय

भवसागर में पड़े हुए जीवों के लिए शिवाश्रय ही दु:ख निवृत्ति की सुखद नौका है। शिव शब्द कल्याण का पर्याय है। पुराणों के अनुसार जगत कल्याण के लिए भगवान शिव ने विषपान किया। विष के बाद ही अमृत मिलता है और बिना अमृत के कल्याण नहीं होता है। भगवान शिव ने विष को कंठ में रखा। तत्वत: विष ही विषय विकार है, इसको न मुंह में रखा जा सकता है और हृदय में। महर्षि पाणिनी के अनुसार कंठ से उच्चरित होने वाले वर्ण अ, कवर्ग, ह और विसर्ग हैं। ह और विसर्ग 'हं स:Ó साधकों का अजपा जप है जिसे वे प्रत्येक श्वांस में जपते हैं। इन्हीं के द्वारा उस विष रूपी विषय विकार को निष्क्रिय करना ही कल्याणकारी होगा। जीव अपनी विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए तद्-तद् वस्तु द्वारा भगवान शिव का अभिषेक करता है, जैसे लक्ष्मी कामना हेतु गन्ने के रस से, रोग नाश के लिए कुशोदक से। अभिषेक शिव का होता है, फल जीव को मिलता है। अत: जीव का शिव से अति सामीप्य है। तत्वत: हम दूसरे का कल्याण करेंगे तो मेरा भी कल्याण होगा, शिवोपासना का यही अर्थ है। सावन भगवान शिव का प्रिय महीना है। इस माह में नदियों में जल, पुष्प, दूर्वा, बेल पत्र आदि सुलभ होता है। यह महीना जीव मात्र को शिव सा बन जाने का संदेश देता है।
-आचार्य पं. हरीन्द्र नारायण दूबे, पुजारी जटाशंकर शिव मंदिर

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