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प्रस्तुतकर्ता
Karupath
को
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16 सितंबर 2015 को हरितालिका तीज व्रत है। यह व्रत सुहागिनें अखंड सौभाग्य के लिए रहती हैं। भाद्रपद के शुक्ल 3 को यह व्रत किया जाता है। इसमें द्वितीया का योग निषेध व चतुर्थी का योग श्रेष्ठ माना जाता है। इस व्रत में मुख्य रूप से शिव, पार्वती व गणेश के पूजन का विधान है। इस व्रत में पूरे दिन जल तक ग्रहण नहीं किया जाता है।
कैसे करें व्रत
व्रती महिलाओं को चाहिए कि पूजा की सामग्री एकत्र कर लें और संकल्प कर कलश स्थापित करें। कलश पर शिव-गौरी की प्रतिमा स्थापित कर उनका पूजन करें। सायंकाल तिल, घी आदि से आहुति दें। द्वितीय दिन आठ या सोलह ब्राह्म्ण दंपतियों को भोजन कराएं।
व्रत कथा
इस व्रत को सर्व प्रथम गिरिराज नंदिनी उमा ने किया था जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शिव पति के रूप में प्राप्त हुए। कथा के अनुसार दक्ष कन्या सती पिता के यज्ञ में अपने पति शिवजी का अपमान न सहकर योगाग्नि में दग्ध हो गईं। दूसरे जन्म में मैना और हिमवान की तपस्या के फलस्वरूप उनकी पुत्री के रूप में पार्वती नाम से प्रकट हुईं। इस जन्म में भी उनकी स्मृति अक्षुण्ण बनी रही। जब वह कुछ वयस्क हुईं तो मनोनुकूल वर की प्राप्ति के लिए पिता की आज्ञा से तपस्या करने लगीं। उन्होंने वर्षों तक निराहार रहकर कठिन तपस्या की जिसके फलस्वरूप भगवान शिव उन्हें पति रूप में प्राप्त हुए। तभी से यह व्रत प्रचलन में आया।
-आचार्य शरदचंद्र मिश्र
Keywords: hindu
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गूगल खोज से ली गई हैं, यदि किसी फोटो पर किसी को कॉपीराइट विषय पर आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगी।
कैसे करें व्रत
व्रती महिलाओं को चाहिए कि पूजा की सामग्री एकत्र कर लें और संकल्प कर कलश स्थापित करें। कलश पर शिव-गौरी की प्रतिमा स्थापित कर उनका पूजन करें। सायंकाल तिल, घी आदि से आहुति दें। द्वितीय दिन आठ या सोलह ब्राह्म्ण दंपतियों को भोजन कराएं।
व्रत कथा
इस व्रत को सर्व प्रथम गिरिराज नंदिनी उमा ने किया था जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शिव पति के रूप में प्राप्त हुए। कथा के अनुसार दक्ष कन्या सती पिता के यज्ञ में अपने पति शिवजी का अपमान न सहकर योगाग्नि में दग्ध हो गईं। दूसरे जन्म में मैना और हिमवान की तपस्या के फलस्वरूप उनकी पुत्री के रूप में पार्वती नाम से प्रकट हुईं। इस जन्म में भी उनकी स्मृति अक्षुण्ण बनी रही। जब वह कुछ वयस्क हुईं तो मनोनुकूल वर की प्राप्ति के लिए पिता की आज्ञा से तपस्या करने लगीं। उन्होंने वर्षों तक निराहार रहकर कठिन तपस्या की जिसके फलस्वरूप भगवान शिव उन्हें पति रूप में प्राप्त हुए। तभी से यह व्रत प्रचलन में आया।
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